जल गया क्लब हाउस... फिर भी बच गया अंग्रेजों के समय का ये महंगा पियानो, गुलमर्ग की 100 साल पुरानी कहानी हैरान करेगी
Gulmarg Steinway piano: गुलमर्ग के गोल्फ कोर्स क्लब हाउस में 100 साल से भी पुराना स्टेनवे एंड सन्स का पियानो ...और पढ़ें

गुलमर्ग के क्लब हाउस में आज भी रखा है अंग्रेजों के दौर का पियानो।
HighLights
गुलमर्ग गोल्फ कोर्स क्लब हाउस में 100 साल पुराना स्टेनवे पियानो।
यह पियानो कबायली हमलों और क्लब हाउस की आग से बचा।
स्थानीय लोग इसे गुलमर्ग की संगीत विरासत के रूप में पुनर्स्थापित चाहते हैं।
राहुल शर्मा, गुलमर्ग। कश्मीर को जन्नत कहा जाता है और गुलमर्ग उसका ताज, लेकिन इसी ताज में छुपा है एक ऐसा राज, जिसे देखकर यहां आने वाले पर्यटक भी आश्चर्य चकित रह जाते हैं। दुनिया के सबसे ऊंचे ग्रीन गोल्फ कोर्स, गुलमर्ग गोल्फ कोर्स के क्लब हाउस में आज भी एक 100 साल से भी ज्यादा पुराना स्टेनवे एंड सन्स का पियानो रखा है। यह कोई आम पियानो नहीं है।
यह वही ब्रांड है जो दुनिया का सबसे महंगा पियानो बनाता है। जॉन लेनन से लेकर आज के बड़े संगीतकार इसी कंपनी का पियानो बजाते हैं। इस पियानो पर लिखा है- स्टेनवे एंड सन्स, न्यूयॉर्क, लंदन, हैम्बर्ग।
जानकारों के मुताबिक, यह पियानो 1910 से 1920 के बीच इंग्लैंड से यहां लाया गया था, जब अंग्रेज गुलमर्ग को अपनी गर्मियों की राजधानी बनाते थे।
आपको बता दें कि स्टेनवे कंपनी 1853 में न्यूयॉर्क में बनी थी और ब्रिटेन में महारानी ऐसे ही पियानो अपने क्लब और नेडूस जैसे होटलों के लिए इंग्लैंड से मंगवाते थे। माइकल हेनरी नेडू ने 1888 में गुलमर्ग में अपना पहला होटल बनाया था, जहां शाम को बिलियर्ड्स और म्यूजिक बजता था।

गुलमर्ग का 100 साल पुराना स्टेनवे पियानो...
जलते क्लब हाउस से कैसे बचा पियानो?
1902 से 1947 तक ये क्लब हाउस ब्रिटिश हुकूमत की ऐशगाह हुआ करता था। यहां अपर इंडिया गोल्फ चैंपियनशिप, नेडूस कप जैसे बड़े टूर्नामेंट की लिस्ट आज भी दीवारों पर लगी है। लेकिन 1947 में आजादी के बाद हुए कबायली हमले में गुलमर्ग पर कब्जा हो गया।
बहुत सी चीजें लूट ली गईं या जला दी गईं, लेकिन स्टेनवे जैसा पूरी तरह लकड़ी से बना यह भारी पियानो- जो 300 किलो से ज्यादा का था, उसे कोई उठा नहीं पाया। इसलिए वो वहीं रह गया। 1948 में आग लगने से पूरा वास्तविक क्लब हाउस जल कर राख हो गया। उसमें भी यह पियानो क्षतिग्रस्त होने से बच गया।
5 साल के सन्नाटे के बाद जम्मू-कश्मीर सरकार ने क्लब और क्लब हाउस को फिर से खड़ा किया। तब तक 'लोअर कोर्स' और 'रैबिट्स कोर्स' खत्म हो चुके थे, सिर्फ 'अपर कोर्स' बचा था। लेकिन दुनिया के सबसे ऊंचे गोल्फ कोर्स पर खेलने का लालच कौन रोक सकता था? 1953 में क्लब का पुनरुद्धार हर गोल्फर के लिए एक रोशनी की किरण बन गया। यह पियानो उसी विरासत के तौर पर वहीं रख दिया गया।
1976 - जब प्रोफेशनल गोल्फ आया
पचास और साठ के दशक में यह क्लब गुलमर्ग की शान बन गया। आजादी से पहले की ट्रॉफियों के लिए जबरदस्त मुकाबले होते, और चैंपियन क्लब बार में जश्न मनाते। क्लब डिनर, डांस और लाइव बैंड- गुलमर्ग फिर से जी उठा था।
सत्तर के दशक में गुलमर्ग ने प्रोफेशनल गोल्फ में कदम रखा। पहली बार 1976 में यहां नॉर्दर्न इंडिया ओपन चैंपियनशिप खेली गई। ''बिग गोल्फ'' की मांगों को देखते हुए कोर्स को दिग्गज गोल्फर पीटर थॉमसन ने नए सिरे से डिजाइन किया। बड़े टीइंग एरिया, 6 पिन पोजीशन वाले ग्रीन, और तीन तरह के मार्कर- ट्रेडिशनल टी, लेडीज टी, बैक टी और रिजॉर्ट टी। यानी एक ही कोर्स कभी आसान तो कभी बेहद कठिन बन जाता था।
इसी दौर में ''जश्न-ए-कश्मीर'' (कश्मीर फेस्टिवल) ने इसमें एक नया रंग जोड़ा। पोलो ग्राउंड में घुड़सवारी, रेस, लोक नृत्य और खासतौर पर स्थानीय कैडीज के हैरतअंगेज करतब देखने को मिलते थे।
गुलमर्ग में 130 साल पुरानी संगीत विरासत
आज गुलमर्ग गोल्फ कोर्स 8,700 फीट की ऊंचाई पर 18-होल का इंटरनेशनल कोर्स है। हर साल यहां लाखों टूरिस्ट आते हैं, पर बहुत कम लोग इस पियानो की कहानी जानते हैं। स्थानीय लोग और इतिहास प्रेमी अब मांग कर रहे हैं कि सरकार इस पियानो को एक विरासत उपकरण के रूप में पुनर्स्थापित करें, ताकि गुलमर्ग सिर्फ गोल्फ के लिए नहीं, बल्कि अपनी 130 साल पुरानी संगीत विरासत के लिए भी जाना जाए।
एक टूरिस्ट ने कहा कि हमने सोचा था यहां सिर्फ बर्फ और गोल्फ मिलेगा, लेकिन यहां तो इतिहास का एक जीता-जागता सुर मिल गया।
