राज्य ब्यूरो, श्रीनगर: कश्मीर में पाकिस्तान के सभी मोहरे पिटने के बाद उसका झंडा उठाने वाला कोई नहीं दिख रहा। कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने भी उसकी दोगली नीति से तंग आकर किनारा कर लिया है। ऐसे में पाकिस्तान अब हुर्रियत नेताओं के फर्जी पत्र जारी कर माहौल बिगाड़ने की साजिश रच रहा है। इस बार गिलानी के फर्जी पत्र को आधार बनाकर कश्मीर में फिर हड़ताल करवाने की साजिश रची गई। परिवार के भी इस पत्र से इन्कार के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।

पाकिस्तानी एजेंसियों के माध्यम से सोशल मीडिया पर पत्र वायरल किया गया। इसमें गिलानी की ओर से 8 और 13 जुलाई को हड़ताल के आह्वान का दावा किया गया। पुलिस तुरंत सक्रिय हुई और गिलानी के परिजनों के हवाले से दावा किया गया कि ऐसा कोई पत्र लिखा ही नहीं गया। हालांकि, स्वयं गिलानी चुप हैं। फिलहाल, पुलिस ने फर्जी पत्र को वायरल करने और हालात बिगाड़ने से जुड़ी धाराओं के तहत पत्र को सोशल मीडिया पर जारी करने वालों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।

उधर, सुरक्षा एजेंसियों ने कानून व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए अलर्ट जारी कर दिया गया। पुलिस ने इस पत्र को लेकर अलगाववादी खेमे की गतिविधियों की निगरानी भी शुरू कर दी।

आठ जुलाई को आतंकी बुरहान वानी की बरसी होती है। उसे एक साथी संग सुरक्षाबलों ने आठ जुलाई 2016 को दक्षिण कश्मीर में मार गिराया था। वहीं, अलगाववादी 13 जुलाई 1931 को जम्मू कश्मीर के तत्कालीन शासक के खिलाफ बगावत में मारे गए लोगों की याद में शहीदी दिवस मनाते हैं। पुलिस ने पत्र फर्जी होने का किया दावा

पुलिस ने गिलानी के पत्र को लेकर अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा कि यह पत्र फर्जी है। सैयद अली शाह गिलानी के पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक यह पत्र फर्जी है, गिलानी ने ऐसा कोई पत्र जारी नहीं किया है। यह पत्र पाकिस्तान से ही किसी ने सोशल मीडिया पर अपलोड किया है। इस पत्र को सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर इसे शेयर करने और अग्रेषित करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इस संदर्भ में बड़गाम पुलिस स्टेशन में एफआइआर भी दर्ज कर ली गई है। अलगाववाद की टूट रही कमर, अगुवाई से कतरा रहे सब

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर: कश्मीर में अलगाववादी राजनीति का हश्र यह हो गया है कि अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस को कट्टरपंथी सैयद अली शाह गिलानी का उत्तराधिकारी तक नहीं मिल रहा है। नए कश्मीर में अब कोई भी गिलानी द्वारा छोड़ी गई कुर्सी पर बैठने के लिए सामने नहीं आ रहा है। हुर्रियत का उदारवादी गुट भी चुप है। दोनों गुटों में एकता बघारने वाले घाटी के कुछ खास बुद्धिजीवियों की बोलती बंद है। पाकिस्तान, जहां से कश्मीर की अलगाववादी सियासतदानों के तार हिलते हैं, वहां से भी कोई झंकार नहीं आ रही है।

हुर्रियत से जुड़े सूत्रों ने बताया कि मीरवाइज मौलवी उमर फारुक और उनके करीबी जो अक्सर गिलानी के साथ विभिन्न मुद्दों पर सहमति पर जोर देते थे, वह भी अब कोई भी बात करने से कतरा रहे हैं। कश्मीर में सक्रिय कुछ ट्रेड यूनियन नेता और तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग जो हमेशा अलगाववादी सियासत में सक्रिय रहते हुए हुर्रियत में एकता की कवायद में जुटा रहता था, उसमें भी कोई हलचल नहीं हो रही है। कट्टरपंथी गिलानी के एक करीबी ने कहा कि पहले यहां कई लोग कहते थे कि गिलानी कश्मीर में अलगाववादी सियासत का नेतृत्व सिर्फ अपने पास और अपने पुत्रों के पास रखना चाहते हैं। अब इन लोगों के मुंह पर ताला लग गया है। गिलानी ने गत सप्ताह हुर्रियत से इस्तीफा दे दिया था। उनके इस्तीफे के समय कहा जा रहा था कि अगले दो तीन दिनों में ही उनके उत्तराधिकारी की नियुक्ति हो जाएगी, लेकिन अब तक कोई सामने नहीं आया है। साल 1993 में गठित हुर्रियत कांफ्रेंस 2003 में दो गुटों में बंटी थी और गिलानी कट्टरपंथी गुट की अगुआई कर रहे थे। मीरवाइज मौलवी उमर फारुक उदारवादी गुट के प्रमुख हैं।

Posted By: Jagran

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