झेलम रिवरफ्रंट से निशात गार्डन तक... श्रीनगर की फिजाओं में घुले लोक कला के रंग, देश-विदेश के मेहमान देख रहे असली कश्मीर
श्रीनगर में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल जम्मू-कश्मीर (आइएफएफजेके) के दौरान स्थानीय कलाकार ऐतिहासिक स्थलों पर जम्मू-कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित कर रहे हैं।
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डल झील में तैरते पानी में दिखाई गई कश्मीर की कली फिल्म। फोटो जागरण
HighLights
आइएफएफजेके में स्थानीय कलाकार जम्मू-कश्मीर की संस्कृति प्रदर्शित कर रहे हैं।
श्रीनगर के ऐतिहासिक स्थलों पर लोक कला की प्रस्तुतियाँ हो रही हैं।
फिल्म फेस्टिवल सिनेमा संग पारंपरिक कलाओं को एक मंच दे रहा है।
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर इन दिनों सिर्फ फिल्मों की कहानियां नहीं देख रहा, बल्कि अपनी मिट्टी की कहानियां भी सुना रहा है। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल जम्मू-कश्मीर (आइएफएफजेके) के बीच शहर के ऐतिहासिक और खूबसूरत स्थलों पर स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियां लोगों को जम्मू-कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रही हैं।
झेलम के किनारे से लेकर निशात गार्डन तक संगीत, लोक परंपराओं और पारंपरिक कलाओं की गूंज फेस्टिवल के माहौल को और खास बना रही है। इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (उीआइपीआर) ने जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी (जेकेएएसीएल) के सहयोग से किया है।
देश-विदेश से आए मेहमान के सामने प्रस्तुति
फेस्टिवल के दौरान करीब 400 स्थानीय कलाकार अलग-अलग कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल दर्शकों का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की कला और सांस्कृतिक पहचान को देश-विदेश से आए मेहमानों के सामने प्रस्तुत करना भी है।

राजबाग स्थित झेलम रिवरफ्रंट, ओल्ड जीरो ब्रिज, शेर-ए-कश्मीर पार्क, निशात गार्डन और एसकेआइसीसी जैसे स्थान इन दिनों सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र बने हुए हैं। इन जगहों पर कलाकार पारंपरिक और लोक कला शैलियों के जरिए कश्मीर की उस सांस्कृतिक दुनिया को सामने ला रहे हैं, जो पीढ़ियों से यहां की पहचान का हिस्सा रही है।
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संस्कृति से रूबरू होने का अवसर
फिल्म फेस्टिवल में पहुंचे प्रतिनिधियों और पर्यटकों के लिए यह अनुभव खास इसलिए भी है क्योंकि उन्हें फिल्मों के साथ उस संस्कृति से रूबरू होने का मौका मिल रहा है, जिसने लंबे समय से जम्मू-कश्मीर की कहानियों और रचनात्मकता को प्रभावित किया है।
10 सितंबर को फेस्टिवल के समापन दिवस पर भी सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। निर्धारित स्थलों पर शाम पांच बजे से सात बजे 7 बजे तक कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे।
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आइएफएफजेके ने इस तरह सिनेमा को केवल पर्दे तक सीमित नहीं रखा है। फिल्मों के साथ संगीत, लोक कला और पारंपरिक प्रस्तुतियों को जोड़कर फेस्टिवल श्रीनगर के सार्वजनिक और सांस्कृतिक स्थलों को एक बड़े खुले मंच में बदल रहा है। यही वजह है कि इन दिनों श्रीनगर में सिनेमा के साथ-साथ कश्मीर की अपनी सांस्कृतिक कहानी भी मंच पर दिखाई दे रही है।
