चांगथांग से दिल्ली के रैंप तक... पश्मीना के धागों में बुनी लद्दाख की नई कहानी, फैशन वीक में छाया सदियों पुराना हुनर
लद्दाख की सदियों पुरानी पश्मीना विरासत ने दिल्ली के फैशन रैंप पर 'द फिफ्थ सीजन' के माध्यम से अपनी चमक ...और पढ़ें

फैशन वीक में बिखरी लद्दाखी पश्मीना की मखमली चमक। फोटो जागरण
HighLights
दिल्ली फैशन रैंप पर लद्दाख की पश्मीना विरासत का प्रदर्शन।
'द फिफ्थ सीजन' ने परंपरा और आधुनिकता का संगम दिखाया।
स्थानीय कारीगरों और समुदायों को आर्थिक लाभ देने पर जोर।
नवीन नवाज, श्रीनगर। चांगथांग के करीब 14 हजार फीट ऊंचे बर्फीले चरागाहों में पलने वाली चांगरा बकरियों के महीन रेशों से जन्म लेने वाला पश्मीना महज एक बेशकीमती वस्त्र नहीं, बल्कि लद्दाख की सदियों पुरानी विरासत, पीढ़ियों के हुनर और दुश्वारियों से जूझते जीवन की जीवंत गाथा है।
रविवार को जब इसी पश्मीना की मखमली चमक दिल्ली के फैशन रैंप पर बिखरी, तो मानो हिमालय की ऊंची वादियों की खुशबू, वहां के लोगों की मेहनत और उनकी सांस्कृतिक धरोहर ने राजधानी के दिल में दस्तक दी।
लैक्मे फैशन वीक और फैशन डिजाइन काउंसिल ऑफ इंडिया (एफडीसीआई) के संयुक्त आयोजन में प्रस्तुत ‘द फिफ्थ सीजन: ए फैशन स्टोरी फ्रॉम लद्दाख’ ने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक खूबसूरत ताना-बाना बुना।

आत्मनिर्भरता और सुनहरे भविष्य की नई उम्मीदें
यहां रैंप पर सिर्फ आकर्षक परिधानों की नुमाइश नहीं हुई, बल्कि उन अनदेखे हाथों के हुनर, संघर्ष और सृजनशीलता को भी सम्मान मिला, जिनकी पीढ़ियों की साधना ने लद्दाख के पश्मीना को दुनिया भर में विशिष्ट पहचान दिलाई है।
यह प्रस्तुति दरअसल हिमालय की गोद से निकली उस विरासत का उत्सव थी, जो अब फैशन की चमक के साथ आत्मनिर्भरता और सुनहरे भविष्य की नई उम्मीदें भी बुन रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस शोकेस की सबसे बड़ी विशेषता चांगथांग के कारीगरों की भागीदारी रही।

फैशन की चकाचौंध के बीच उनकी मौजूदगी ने याद दिलाया कि पश्मीना की असली खूबसूरती केवल उसके महीन रेशों में नहीं, बल्कि उन पशुपालकों, बुनकरों और महिला कारीगरों के हुनर में भी है, जिनकी मेहनत से यह अनमोल वस्त्र तैयार होता है। पीढ़ियों से हस्तांतरित यह पारंपरिक ज्ञान आज आधुनिक बाजारों में नई संभावनाएं तलाश रहा है।
आयोजन में लद्दाख की सांस्कृतिक ने भर दी रंगत
लद्दाख के चार डिजाइनरों और हस्तशिल्प ब्रांडों ने इस विरासत को अपने-अपने अंदाज में प्रस्तुत किया। पद्मा यांगचन के ‘नाम्जा’ ने ब्रोकेड और पश्मीना से तैयार 18 परिधानों में पारंपरिक बुनावट को आधुनिक रूप दिया।

स्टैनजिन पाल्मो के ‘जिलजोम’ ने चांगथांग के प्राकृतिक दृश्यों से प्रेरित सिल्क प्रिंट और पारंपरिक ऊनी वस्त्र ‘स्नाम्बू’ की समकालीन व्याख्या के साथ 18 परिधान पेश किए। डेस्किट आंग्मो के ‘चांगरा लद्दाख’ और रिगजिन यांगडोल के ‘चरखा लद्दाख’ ने हाथ से काते और बुने पश्मीना शॉलों के जरिए स्थानीय शिल्प की प्रामाणिकता और बारीकी को रेखांकित किया।
शालिनी पासी ने ‘जिलजोम’ के डिजाइन किए गाउन में शोस्टॉपर के रूप में प्रस्तुति को खास बनाया, जबकि दशुग्स बैंड की लाइव संगीत प्रस्तुति ने आयोजन में लद्दाख की सांस्कृतिक रंगत भर दी।

डिजाइन, उद्यमिता और व्यापक बाजारों से जोड़ने पर जोर
लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने वर्चुअल संबोधन में इस पहल की सराहना करते हुए पारंपरिक शिल्प को समकालीन डिजाइन, उद्यमिता और व्यापक बाजारों से जोड़ने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि पश्मीना की बढ़ती पहचान का लाभ उन पशुपालकों, बुनकरों, कारीगरों, महिला उद्यमियों और स्वयं सहायता समूहों तक पहुंचना चाहिए, जो इस विरासत के वास्तविक संवाहक हैं। बाजार का विस्तार करते हुए पारंपरिक शिल्प की मौलिकता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
केंद्रीय एमएसएमई मंत्रालय की ‘रैम्प’ योजना के तहत लद्दाख के उद्योग एवं वाणिज्य विभाग ने एफडीसीआई के सहयोग से इस पहल को आगे बढ़ाया है।
साझा सुविधा केंद्रों, कौशल उन्नयन और उत्पादन सुविधाओं में सुधार के माध्यम से स्थानीय हस्तशिल्प तथा हथकरघा उद्यमों को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। उद्देश्य साफ है स्थानीय हुनर को पहचान मिले, रोजगार बढ़े और पश्मीना की पूरी उत्पादन शृंखला का अधिक आर्थिक लाभ स्थानीय समुदायों तक पहुंचे।
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कारोबारी संबंधों और बाजार के अवसरों को बढ़ावा देने का प्रयास
इस दिशा में अगला महत्वपूर्ण कदम 23 और 24 अक्टूबर को प्रस्तावित लद्दाख पश्मीना कॉन्क्लेव होगा। इसमें 50 से अधिक स्टॉल और 100 से ज्यादा उद्यमियों तथा खरीदारों की भागीदारी की उम्मीद है। उत्पादकों, डिजाइनरों और खरीदारों को एक मंच पर लाकर यह आयोजन नए कारोबारी संबंधों और बाजार के अवसरों को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।
चांगथांग के चरागाहों से दिल्ली के रैंप तक पहुंची यह यात्रा महज फैशन की कहानी नहीं है। यह उन लोगों के सम्मान, आजीविका और पहचान की कहानी है, जिनके हाथों में लद्दाख की परंपरा सुरक्षित है। ‘द फिफ्थ सीजन’ ने इसी संदेश को सामने रखा कि जब विरासत को आधुनिक अवसरों से जोड़ा जाता है, तो परंपरा अतीत की स्मृति बनकर नहीं रह जाती, बल्कि भविष्य की संभावनाओं में बदल जाती है।
