महिला को गुजारा चलाने के लिए दूसरी शादी की जरूरत नहीं, श्रीनगर कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला; पति देगा 20 लाख मुआवजा
श्रीनगर अदालत ने फैसला सुनाया है कि वैवाहिक संबंध टूटने के बाद महिला को गुजारा चलाने के लिए दूसरी शादी ...और पढ़ें

कोर्ट ने कहा- पत्नी को 20 लाख मुआवजा, हर माह 45 हजार भी देने होंगे (फाइल फोटो)
HighLights
महिला को गुजारा चलाने के लिए दूसरी शादी की जरूरत नहीं।
पति को महिला और बेटी के लिए आर्थिक सहायता का आदेश।
घरेलू हिंसा के लिए 20 लाख रुपये मुआवजा मंजूर किया।
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। वैवाहिक संबंध टूटने के बाद किसी महिला से अपनी आजीविका के लिए दूसरी शादी करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। शादी करना या न करना उसका व्यक्तिगत निर्णय है और उसकी स्वायत्तता व गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए। श्रीनगर की विशेष मोबाइल मजिस्ट्रेट मसर्रत जबीन की अदालत ने घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में यह टिप्पणी की।
अदालत ने शीमा इकबाल उर्फ शबनम की याचिका पर सुनवाई करते हुए पति को महिला और उसकी नाबालिग बेटी के लिए आर्थिक सहायता देने का आदेश दिया। अदालत ने मानसिक प्रताड़ना और भावनात्मक पीड़ा के लिए 20 लाख रुपये मुआवजा भी मंजूर किया। महिला ने 40 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी।
हर माह 45 हजार रुपये देने का आदेश
अदालत ने पति को महिला के लिए 15 हजार रुपये प्रतिमाह, उसके साथ रह रही नाबालिग बेटी के भरण-पोषण, शिक्षा और चिकित्सा खर्च के लिए 20 हजार रुपये प्रतिमाह तथा आवास के किराए के लिए 10 हजार रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया है। किसी अन्य अदालत से इसी अवधि के लिए मिलने वाली राहत का समायोजन किया जाएगा।
घरेलू हिंसा में मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना भी शामिल
अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा केवल शारीरिक मारपीट तक सीमित नहीं है। मानसिक, भावनात्मक, मौखिक और आर्थिक प्रताड़ना के साथ आर्थिक संसाधनों से वंचित करना और आवास से संबंधित अधिकारों को प्रभावित करना भी कानून के दायरे में आता है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रभा त्यागी बनाम कमलेश देवी फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा कानून का संरक्षण पुराने घरेलू संबंधों से जुड़े मामलों में भी लागू हो सकता है।
बाद में वैवाहिक संबंध खत्म होने से पहले की हिंसा खत्म नहीं होती
पति ने वैवाहिक संबंध समाप्त होने का हवाला देते हुए मामले की सुनवाई पर सवाल उठाया था। अदालत ने कहा कि संबंध बाद में समाप्त हो जाने से उस दौरान हुई कथित घरेलू हिंसा के लिए उपलब्ध कानूनी संरक्षण अपने आप समाप्त नहीं होता।
मामले के अनुसार, महिला की शादी प्रतिवादी से हुई थी और उनकी तीन बेटियां हैं। दोनों के बीच विवाद के बाद अलगाव और फिर सुलह हुई थी। इसके बाद दोनों ने दोबारा निकाह किया। बाद में महिला अपनी एक नाबालिग बेटी के साथ अलग रहने लगी। उसने पति और सास पर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। प्रतिवादियों ने आरोपों से इनकार किया था।
अदालत ने कहा कि महिला की अपनी आय न होने और नाबालिग बच्चे की जिम्मेदारी होने की स्थिति में उसकी आर्थिक व आवासीय सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण की राशि हर मामले में संबंधित पक्षों की आय, जरूरत और परिस्थितियों के आधार पर तय होगी।
