झेलम किनारे गूंजे गणपति के जयकारे, घाटी में जुटे कश्मीरी हिंदू; बच्चों ने पहली बार पूर्वजों की धरती पर देखा गणेश विसर्जन
श्रीनगर में कश्मीरी हिंदुओं ने झेलम नदी के तट पर गणेश विसर्जन कर 35 साल पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित किया। ...और पढ़ें

झेलम किनारे गूंजे गणपति के जयकारे। फोटो जागरण
HighLights
कश्मीरी हिंदुओं ने श्रीनगर में गणेश विसर्जन की परंपरा पुनर्जीवित की।
झेलम तट पर 35 साल बाद ऐतिहासिक गणेश विसर्जन हुआ।
आतंकी धमकियों के बावजूद श्रद्धालुओं ने उत्साह से भाग लिया।
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। पिछले तीन महीनों में आतंकवादी संगठनों से छह से अधिक धमकियां मिलने के बावजूद कश्मीरी हिंदुओं ने अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को जारी रखने का संकल्प दिखाया। इसी क्रम में श्रीनगर में बड़ी संख्या में कश्मीरी हिंदू गणेश विसर्जन के लिए जुटे। प्रतिभागियों ने इसे दशकों से लगभग गायब रही परंपरा का ऐतिहासिक पुनरुद्धार बताया।
संघर्ष और पलायन के लंबे दौर के बीच करीब 35 साल से थमी एक पुरानी परंपरा रविवार को श्रीनगर में फिर जीवंत होती दिखाई दी। कश्मीरी हिंदुओं ने झेलम नदी के तट पर गणेश विसर्जन किया। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस आयोजन में शामिल हुए और इसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दोबारा जुड़ने का भावुक अवसर बताया।

विधि-विधान के साथ प्रतिमा का विसर्जन
पुराने शहर के हब्बा कदल स्थित प्राचीन श्री सिद्धि विनायक गणेश मंदिर (गणपतयार) में सप्ताहभर चले धार्मिक आयोजनों और विशेष वार्षिक हवन के बाद भव्य शोभायात्रा निकाली गई। यात्रा खर्यार, क्राल खुद, नई सड़क और बडियार समेत पुराने शहर के विभिन्न इलाकों से गुजरते हुए श्री गणेश घाट पहुंची, जहां विधि-विधान के साथ प्रतिमा का विसर्जन किया गया।
सोनवार के शिव मंदिर से भी गणेश प्रतिमा की शोभायात्रा निकाली गई। श्रद्धालुओं ने भजन और जयकारों के साथ झेलम के तट तक यात्रा की और धार्मिक रीति-रिवाजों के बीच विसर्जन संपन्न किया। आयोजन की खास बात यह रही कि देश के अलग-अलग हिस्सों से कश्मीरी हिंदू अपने परिवारों के साथ श्रीनगर पहुंचे। कई बच्चों के लिए यह कश्मीर में पहली गणेश विसर्जन यात्रा थी। उन्होंने इसे अपने पूर्वजों की भूमि और विरासत से जुड़ने का यादगार अनुभव बताया।

संस्कृति और सूफी परंपरा आज भी कायम
कश्मीरी हिंदू नेता मोहित भान ने कहा कि कश्मीर की साझा संस्कृति और सूफी परंपरा आज भी कायम है। उनके मुताबिक, लोगों का सहयोग यह संदेश देता है कि कश्मीरी हिंदू अकेले नहीं हैं। आयोजकों और प्रतिभागियों ने उम्मीद जताई कि ऐसे आयोजन घाटी की पुरानी साझा सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने और कश्मीरी पंडितों के कश्मीर से भावनात्मक जुड़ाव को और गहरा करने में भूमिका निभाएंगे।
