बांड पाथर क्या है? कश्मीर की सदियों पुरानी लोककला ने फिल्म फेस्टिवल में जीता दिल, जानें कैसे कहती है समाज की कहानी
जम्मू-कश्मीर के पहले अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में बांड पाथर लोक थिएटर ने अपनी जीवंत प्रस्तुति से देसी-विदेशी मेहमानों का ध्यान ...और पढ़ें

'बांड पाथर' घाटी की एक प्राचीन व प्रसिद्ध लोक कला है। (फाइल फोटो)
HighLights
बांड पाथर ने फिल्म महोत्सव में अपनी अनूठी पहचान बनाई।
पारंपरिक वेशभूषा और व्यंग्य से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
कलाकार इस प्राचीन कला को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाना चाहते हैं।
रजिया नूर, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के पहले अंततराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में भले ही कैमरे सितारों, फिल्मनिर्माताओं और सिनेमा की दुनिया पर केंद्रित थे, लेकिन लोक संगीत की तरह घाटी के सदियों पुराने लोक थिएटर 'बांड पाथर' ने एक अलग ही नज़ारा पेश किया जो एकदम असली, ज़मीन से जुड़ा और घाटी की सांस्कृतिक यादों में गहराई से बसा हुआ था। पारंपरिक वस्तर पहने जब कलाकार मंच पर आए, तो उनकी जीवंत हरकतें, व्यंग्य और पारंपरिक संगीत ने महोत्सव में शामिल फिल्मनिर्माताओं, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और गायकों का ध्यान खींचा।
इससे बाहर से आए फिल्म जगत के लोगों को कहानी कहने की एक ऐसी शैली की झलक मिली जो पीढ़ियों से चली आ रही है। बांड पाथेर के कलाकारों के लिए, यह महोतस्व न केवल मनोरंजन करने का, बल्कि घाटी की सबसे पुरानी प्रदर्शन कलाओं में से एक से बड़े दर्शकों को परिचित कराने का मौका भी था।
बांड पाथर क्या है
बता देते हैं कि बांड पाथर घाटी की एक प्राचीन व प्रसिद्ध लोक कला है जिसमें कलाकार विशेष वस्त्र पहन 'नाटकों' जिन्हें 'पाथर' कहा जाता है, का मंचन कर विभिन्नि सामाजिक मुद्दों को व्यंज्ञातमिक तरीके से उभारते हैं। बता दें कि 'बांड पाथर' में पुरुष ही महिलाओं का किरदार अदा करते हैं।
प्रदर्शन करने वाले समूह के एक सदस्य मोहम्मद अमीन भगत ने कहा, 'बांड पाथेर सिर्फ़ एक परफार्मेंस नहीं है, यह लोगों की आवाज़ है। हास्य, व्यंग्य और किरदारों के ज़रिए हम समाज, उसकी समस्याओं और बदलते समय के बारे में बात करते हैं।
भगत ने बताया कि यह लोक थिएटर पारंपरिक रूप से गांव-गांव घूमता था, लोगों को खुली जगहों पर इकट्ठा करता था और रोज़मर्रा के अनुभवों को ऐसी कहानियों में बदल देता था जो दर्शकों को हंसाने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करती थीं।
उन्होंने कहा, 'लोग बांड पाथर देखने के लिए बड़ी संख्या में इकट्ठा होते थे। तब सिनेमा, टेलीविजन या सोशल मीडिया नहीं था, लेकिन यह थिएटर लोगों को कहानियों, संगीत और एक-दूसरे से जोड़ता था।'
कलाकारों का कहना है कि इस कला की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी है। एक अन्य कलाकार फिरदौस फिदा ने कहा, 'हमारा मंच कहीं भी हो सकता है। हमें बड़े सेट या महंगे उपकरणों की ज़रूरत नहीं होती। हमें बस कलाकार, संगीत और दर्शक चाहिए होते हैं। परफार्मेंस के ज़रिए कहानी जीवंत हो उठती है।'
फिल्म जगत के लोगों का भी दिल जीता
महोत्सव में इस पारंपरिक परफार्मेंस ने फिल्म जगत के लोगों का भी दिल जीत लिया, उनमें से कई लोगों को लोक थिएटर और आज के सिनेमा के बीच समानताएं नज़र आईं। 'बांड पाथर' से जुड़े कलाकारों का कहना है कि इस लोक कला में हमेशा से अच्छे सिनेमा वाले तत्व मौजूद रहे हैं जैसे किरदार, टकराव, हास्य, भावनाएं संगीत और सामाजिक टिप्पणी।
माजिद अहमद नामक एक अन्य कलाकार ने कहा, 'बांड पाथर में हर जगह कहानियां हैं। कश्मीर खुद एक कहानी है और हमारी परंपरा ने परफार्मेंस के ज़रिए उनमें से कई कहानियों को संजोकर रखा है।' कलाकारों का मानना है कि फिल्म महोतस्व जैसे प्लेटफार्म से ज़्यादा पहचान मिलने पर बांड पाथर को कश्मीर से बाहर ले जाया जा सकता है और उन दर्शकों तक पहुंचाया जा सकता है जो इस क्षेत्र के पारंपरिक थिएटर से अनजान हैं।
बांड पाथर ने दिखाई कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत
कलाकारों ने कहा, 'हम चाहते हैं कि युवा बांड पाथर को सिर्फ़ पुरानी चीज़ न समझें, बल्कि एक जीवित परंपरा के तौर पर देखें। यह अपनी मूल भावना को खोए बिना विकसित हो सकता है।' दर्शकों में से कई लोगों के लिए, यह परफार्मेंस कश्मीर के मशहूर नज़ारों से परे उसकी संस्कृति को जानने का एक ज़रिया बन गई। जहां इस महोतस्व में भारत और विदेशों की फ़िल्में दिखाई गईं, वहीं बांड पाथर ने दर्शकों को याद दिलाया कि कश्मीर की कहानी कहने की परंपरा कैमरे के आने से बहुत पहले से मौजूद थी।
जब कलाकारों ने अपना परफार्मेंस खत्म किया, तो दर्शकों की तालियों ने उस कला को सही सम्मान दिया जिसने बदलते समय का सामना किया है।
बांड पाथर के लिए, महोत्सव का मंच सिर्फ़ परफार्मेंस की जगह नहीं था। यह कश्मीर के सांस्कृतिक अतीत और उसके उभरते हुए सिनेमाई भविष्य के मिलन का स्थान था।
