सिर्फ लद्दाख ही क्यों? अब कश्मीर में भी खुबानी की खेती, एक्सपर्ट्स ने बताया कमाई बढ़ाने का तरीका
कश्मीर घाटी के बागवान अब सेब के साथ खुबानी की व्यावसायिक खेती पर ध्यान दे रहे हैं, जिसका उद्देश्य बागवानी ...और पढ़ें

घाटी में खुबानी की खेती से बदलेगी बागवानी की तस्वीर। (फाइल फोटो)
HighLights
कश्मीर में खुबानी की व्यावसायिक खेती से आय बढ़ाने की संभावना।
वैज्ञानिक तरीकों और मूल्य संवर्धन से लद्दाख को टक्कर देने का लक्ष्य।
बेहतर प्लांटिंग, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से किसानों को लाभ।
रजिया नूर, श्रीनगर। खूबानी विशेषकर अच्छी क्वालिटी की खूबानी के लिए अभी तक केवल लद्दाख ही नाम आता है, लेकिन अब घाटी के ल उत्पादक भी सेब, अखरोट, नाशपाती से आगे अपनी बागवानी की अर्थव्यवस्था में अलग-अलग तरह के बदलाव लाने की कोशिश कर रहें हैं और इसके लिए खुबानी को एक अच्छे व्यावासायी फसल के तौर पर देख रहे हैं और इस फसल को काश्त भी कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि घाटी का पर्यावरण, अच्छी जेनेटिक डायवर्सिटी और बेहतर किस्मों की मौजूदगी इसकी खेती को बढ़ाने की काफी गुंजाइश देती है। उनके अनुसार यदि इसके उत्पादन की तरफ गंभीरता से ध्यान दिया जाए तो इसको वयावसायिक स्तर पर निर्यात किया जा सकता है।
खुबानी पारंपरिक रूप से प्रदेश के कुछ हिस्सों में उगाई जाती रही है। लद्दाख में इसे व्यावसायक स्तर पर इसकी काश्त की जाती है, जबकि घाटी में इसकी व्यवसायिक क्षमता का अभी भी काफी हद तक इस्तेमाल नहीं हुआ है। विशषज्ञों का मानना है कि संगठित बाग, वैज्ञानिक खेती और बेहतर प्लांटिंग मटीरियल इस फल को उगाने वालों के लिए आय का एक अतिरिक्त स्रोत बना सकते हैं।
कश्मीर में खूबानी की खेती का बढ़ेगा दायरा
स्कास्ट के फकल्टी आफ हार्टिकलचर में बतौर प्रोफेसर तैनात डा फरहत शाहीन ने कहा,घाटी में खुबानी फसल के लिए अपार संभावनाएं है। अब ज़रूरी यह है कि पारंपरिक खेती से हटकर वैज्ञानिक तरीके से मैनेज किए गए कमर्शियल बागों की ओर बढ़ा जाए, जिसमें अच्छी क्वालिटी के प्लांटिंग मटीरियल और सही प्रजातियों पर ज़ोर दिया जाए।
आईसीएआर-सेंट्रल इंस्टीट्यूट आफ़ टेम्परेट हार्टिकल्चर, श्रीनगर और स्कास्ट के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध में इस क्षेत्र के लिए खुबानी की कई प्रयाजितयों की जांच की गई है, जिसमें हारकोट, न्यू कैसल, ईरानी आदि शामिल हैं। वैज्ञानिकों ने यील्ड, फल के साइज़, क्वालिटी और फल पकने के टाइम में काफी अंतर पाया है, जिससे उत्पादकों को अलग-अलग जगहों और मार्केट की ज़रूरतों के हिसाब से आप्शन मिल रहे हैं।
सुखाने-प्रोसेसिंग से खूबानी में बढ़ सकता है मुनाफा
खुबानी की काश्त करने वाले दिलावर अहमद मागरे नामक एक उत्पादक ने कहा, 'हम पारंपरिक रूप से दूसरी फलों की फसलों के साथ खुबानी के पेड़ लगाते रहे हैं। इसमें अच्छा स्कोप है, लेकिन उत्पादकों को बड़े पैमाने पर निवेश करने से पहले अच्छी क्वालिटी के प्लांटिंग मटीरियल, टेक्निकल गाइडेंस और एक भरोसेमंद मार्केट की ज़रूरत है।
अब्दुल हमीद रेशी नामक एक और उत्पादक ने कहा कि असली मौका वैल्यू एडिशन में है।उन्होंने कहा, खुबानी को सिर्फ़ ताज़े फलों की बिक्री तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। अगर सुखाने, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और स्टोरेज की सुविधाएँ स्थानीय स्तर पर विकसित की जाती हैं, तो उत्पादकों को बेहतर मुनाफ़ा मिल सकता है और कम कटाई के मौसम में नुकसान कम हो सकता है।
रखरखाव एक बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि खुबानी का एक फ़ायदा यह है कि इससे ताज़े और प्रोसेस्ड दोनों तरह के तरीकों से आय हो सकती है। फल को सुखाकर पल्प, जैम, जूस और दूसरे प्रोडक्ट्स में प्रोसेस किया जा सकता है, जिससे छोटे पैमाने पर एग्रो-प्रोसेसिंग कंपनियों के लिए मौके बनते हैं और कटाई के मौसम के बाद भी इसका बाज़ार बढ़ता है। डा फरहत ने कहा,वैल्यू एडिशन से खूबानी उत्पादक को दुगना फायदा पहुंचा सकती है।
हालांकि, शैल्फ लाइफ सीमित होने के चलते कटाई के बाद इसका रखरखाव एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। वहीं सही ग्रेडिंग, स्टोरेज, कोल्ड-चेन और प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण उत्पादकों को इसकी मार्केटिंग में जल्दी जलदी करनी पड़ती है और इसमें थोड़ी सी भी देरी का उत्पादकों को खामायजा भुगतना पड़ता है।
ग्रेडिंग, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से बढ़ेगी खुबानी की कीमत
यह फ़सल ऐसे समय में आय में विविधता लाने का भी मौका देती है जब उत्पादक दूसरे विकल्प और एक-दूसरे के पूरक फ़सलों की तलाश में तेज़ी से बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती, बीच और देर से आने वाली किस्में मार्केटिंग का समय बढ़ाने और कम समय में उपज के जमाव को कम करने में मदद कर सकती हैं।
एक और ज़रूरी पहलू घाटी की जेनेटिक संपदा है। वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि घाटी में खुबानी के जर्मप्लाज्म में काफी अलग-अलग तरह के पौधे होते हैं, जो भविष्य में बेहतर पैदावार, क्वालिटी और मार्केट की विसेषता वाली किस्मों की ब्रीडिंग, चुनने और उन्हें विकसित करने के लिए कीमती चीज़ें देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार कमर्शियलाइज़ेशन का मतलब सिर्फ़ क्षेत्रफल बढ़ाना नहीं होना चाहिए। उत्पादकों को एक पूरी वैल्यू चेन चाहिए ,नर्सरी और वैज्ञानिक तरीकों से बाग के रखरखाव से लेकर ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और आर्गनाइज़्ड मार्केटिंग तक। तभी इस फसल से टिकाऊ और बेहतर आय मिल सकती है।
सेब के बाद खुबानी बन सकती है घाटी की नई पहचान
विशेषज्ञों का मानना है कि खुबानी घाटी के बागबानी के मानचित्र पर एक बहुत बड़ी जगह की हकदार है। उनका मानना है कि सेब यदि घाटी के बागों का राजा बना रह सकता है, वहीं दूसरी तरफ अगर खूबानी को वैज्ञानिक तरीकों से उगाने की तरफ गंभीरता से ध्यान दिया जाए तो यह घाटी की अगली बड़ी विविधा से भरी कहानी हो सकती है।
घाटी में तकरीबन 0.35 प्रतिशत जमीन पर खूबानी की काश्त की जाती है और इसे अमूमन गांदरबल, बारामूला और अनंतनाग में उगाया जाता है। जबकि लद्दाख में 2,000 से 2,303 हैकटियर जमीन पर इसकी काश्त की जाती है।
