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70 साल बाद मुआवजे की आस, श्रीनगर एयरपोर्ट से सटी जमीन का विवाद सुलझने की ओर; 600 भू-मालिकों को मिलेगी राहत

Published: Fri, 23 Oct 2026 06:09 PM (IST)

श्रीनगर एयरपोर्ट के पास सेना द्वारा अधिग्रहित 3,879 कनाल जमीन के मुआवजे का सात दशक पुराना विवाद सुलझने की कगार ...और पढ़ें

तीन रुपये सालाना किराये से 20 लाख प्रति कनाल मुआवजे तक पहुंचा। (फाइल फोटो)

तीन रुपये सालाना किराये से 20 लाख प्रति कनाल मुआवजे तक पहुंचा। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. श्रीनगर एयरपोर्ट जमीन विवाद में सात दशक बाद समाधान की उम्मीद।

  2. 600 से अधिक भू-मालिकों को मिलेगा 650 करोड़ रुपये मुआवजा।

  3. तीन रुपये प्रति कनाल से 20 लाख तक पहुंचा मुआवजा।

नवीन नवाज, श्रीनगर। कंटीली तारों के पार बनी इमारतों और पेड़ों को निहारते हुए गुलाम मोहम्मद दुआ करते हैं कि जमीन से जुड़े उनके दस्तावेज सही पाए जाएं और दशकों से लंबित मुआवजे की रकम जल्द उनके बैंक खाते में पहुंचे। सात दशक की उम्र पार कर चुके गुलाम मोहम्मद के लिए यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं, बल्कि जीवन के इस पड़ाव पर अपने हक के मिलने की उम्मीद है।

'तार के उस पार मेरी भी छह कनाल जमीन है। मैं छोटा था, जब फौज ने मेरे पिता से यह जमीन ली थी। सालाना तीन रुपये प्रति कनाल किराया मिलता था, वह भी कभी एक साल बाद तो कभी दो साल बाद। पिता को गुजरे 20 साल हो चुके हैं और मुझे अदालत में अपनी बात रखते हुए भी 14-15 साल हो गए। अब जाकर फैसला हुआ है। रकम मिलेगी तो बच्चों में बांटूंगा और खुद बीवी के साथ हज पर जाऊंगा।' गुलाम मोहम्मद अकेले नहीं हैं। उनके जैसे सैकड़ों भू-मालिक दशकों से मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं।

श्रीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास स्थित 3,879 कनाल जमीन के विवाद में अब महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। केंद्र सरकार ने 600 से अधिक भू-मालिकों के बकाया भुगतान के लिए 650 करोड़ रुपये से अधिक जारी किए हैं। यह राशि फिलहाल जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के खाते में जमा है। लाभार्थियों की सूची और दस्तावेजों का सत्यापन पूरा होने के बाद आने वाले हफ्तों में भुगतान की उम्मीद है।

45 कृषि परिवार मुआवजे के इंतजार में

श्रीनगर एयरपोर्ट के निकट बनहार-वथूरा क्षेत्र की लगभग 3,879 कनाल यानी करीब 484 एकड़ जमीन लंबे समय से रक्षा संपदा विभाग के अधीन है। करेवा दमोडर गांव के लगभग 45 कृषि परिवार इससे जुड़े हैं। इनमें मोहम्मद अयाज डार भी शामिल हैं, जिनके नाम छह कनाल जमीन दर्ज है।

स्वामित्व के दस्तावेज होने के बावजूद जमीन पर सेना का कब्जा बना हुआ है।वर्ष 2015 में बड़ी सर्जरी के दौरान डार को इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ा। मुआवजे की शेष राशि वर्षों तक लंबित रहने से उनके जैसे परिवारों की आर्थिक परेशानियां बढ़ीं। ऐसे में बकाया रकम मिलने की उम्मीद उनके लिए बड़ी राहत है।

तीन रुपये किराये से 20 लाख मुआवजे तक

गुलाम मोहम्मद ने बताया कि वर्ष 1953 के दौरान फाैज ने हमारे गांव के विभिन्न लोगों की जमीन को अब्ले कब्जे में लिया था। लोगों ने एतराज किया,जमीन का मुआवजा मांगा तो तत्कालीन जम्मू-कश्मीर सरकार ने केंद्र के समक्ष मामला उठाया। वर्ष 1959 से सेना ने जमीन के लिए सालाना किराया देना शुरू किया।

शुरुआत में किसानों को तीन रुपये प्रति कनाल मिलते थे। बाद में यह राशि पांच रुपये और वर्ष 2005 के आसपास बढ़कर 1,500 रुपये प्रति कनाल हो गई।वर्ष 2013 में केंद्र सरकार ने जमीन के अधिग्रहण का फैसला किया। इसके बाद किराया बंद हो गया और विवाद मुआवजे की राशि पर केंद्रित हो गया।

पहली किस्त में मिले 4.80 लाख रुपये प्रति कनाल

समाजसेवी और पर्यावरणविद्ध राजा मुजफ्फर बट ने कहा कि रक्षा संपदा विभाग ने छह लाख रुपये प्रति कनाल मुआवजे का प्रस्ताव रखा, लेकिन भू-मालिकों ने इसे अपर्याप्त बताते हुए विरोध किया। उनका दावा था कि एयरपोर्ट के बाहर स्थित जमीन का बाजार मूल्य करीब 50 लाख रुपये प्रति कनाल था।

लंबी कानूनी लड़ाई और हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मुआवजा 20 लाख रुपये प्रति कनाल तय हुआ। वर्ष 2014 के आसपास भू-मालिकों को 4.80 लाख रुपये प्रति कनाल की पहली किस्त मिली। इसके बाद से वे शेष 15.20 लाख रुपये प्रति कनाल के भुगतान का इंतजार कर रहे थे।

संसद से हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला

वर्ष 2015 में पटियाला के तत्कालीन सांसद डा धर्मवीर गांधी ने संसद में यह मुद्दा उठाया। हालांकि, वर्ष 2018 से 2022 के बीच कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।

सात नवंबर 2022 को हाजी शब्बीर सोफी, मोहम्मद अमीन कूचे और मुश्ताक अहमद लोन के प्रतिनिधिमंडल ने श्रीनगर में 15 कोर के तत्कालीन जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल अमरदीप सिंह औजला से मुलाकात कर बकाया मुआवजे का मुद्दा उठाया। वर्ष 2023 में सेना मुख्यालय, नई दिल्ली में भी मामला आगे बढ़ाया गया और रक्षा संपदा महानिदेशक के समक्ष मांग रखी गई।

जमींदारान कमेटी करेवा दमोडर ने भी प्रयास किए, जबकि सांसद आगा रूहुल्लाह ने संसद में प्रभावित भू-मालिकों का मुद्दा उठाया। इसके बावजूद भुगतान में देरी जारी रही और भू-मालिकों को अदालत का रुख करना पड़ा। अधिवक्ता शहनाज रतनपुरी करीब दो वर्षों से उनकी पैरवी कर रही हैं।

650 करोड़ रुपये जारी, सत्यापन का इंतजार

लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद केंद्र सरकार ने 650 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जारी की, जो अब हाईकोर्ट के खाते में जमा है।21 अक्टूबर 2026 को हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल ने बडगाम के उपायुक्त को पत्र लिखकर करेवा दमोडर गांव के लाभार्थियों की अद्यतन सूची एक सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। पत्र में 13 अगस्त और आठ अक्टूबर को भेजे गए पूर्व पत्रों का भी उल्लेख था, जिनका जवाब नहीं मिला था। सूची नहीं मिलने पर मामला अदालत के समक्ष रखने की बात कही गई।

क्या अतिरिक्त मुआवजा भी मिलेगा?

राजा मुजफ्फर बट के अनुसार, भू-मालिकों के सामने अब एक और कानूनी सवाल है। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 जम्मू-कश्मीर में 31 अक्टूबर 2019 से लागू हुआ था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या प्रभावित परिवार इस कानून के तहत अतिरिक्त मुआवजे के हकदार हो सकते हैं।

सात दशक बाद हक मिलने की उम्मीद

तीन रुपये प्रति कनाल सालाना किराये से शुरू हुआ यह विवाद अब 20 लाख रुपये प्रति कनाल के निर्धारित मुआवजे तक पहुंच चुका है। केंद्र सरकार की ओर से 650 करोड़ रुपये से अधिक जारी होने से 600 से अधिक भू-मालिकों को राहत की उम्मीद जगी है।

गुलाम मोहम्मद जैसे बुजुर्गों के लिए यह इंतजार जिंदगी के बचे हुए वर्षों से जुड़ा है। कोई रकम बच्चों में बांटना चाहता है, तो कोई हज पर जाने का सपना पूरा करना चाहता है। लेकिन इस लंबे संघर्ष का वास्तविक अंत तभी होगा, जब बकाया रकम उनके बैंक खातों में पहुंचेगी।