राकेश शर्मा, कठुआ: वर्षो पहले पाकिस्तान की ओर से की जाने वाली अकारण फायरिग के बीच जिस बंजर व जंगलनुमा भूमि को हीरानगर के हजारों किसानों ने अपने खून पसीना बहाकर आबाद किया था, उसे अब खाली करने का सरकारी फरमान जारी हो चुका है। उक्त फरमान से किसानों की नींद उड़ गई है, क्योंकि उनके सामने अब रोजी रोटी का संकट पैदा होते दिखने लगा है। खासकर जब सीमा पर पिछले कुछ माह से जारी संघर्ष विराम के चलते अब शांति है। इस शांत माहौल में किसान अब बिना खौफ के खेती करके नई उम्मीद के साथ अपने जीवन को जीने के सपने देखने लगे हैं।

ऐसे समय में सरकार ने उनकी जमीन को सरकारी संपत्ति घोषित कर अतिक्रमण करार देते हुए उस पर अब खेती नहीं करने का नोटिस भेज दिया है। इस आदेश के बाद हीरानगर के हजारों किसानों के हाथ से अब खेती योग्य जमीन चली जाएगी, जिसे उनकी एक पीढ़ी ने विगत 70 साल से खेती करके अपनी रोजी रोटी के साधन उसी को बना लिए थे, इसमें 90 फीसद किसान छोटे हैं, जिनके पास 5 से 10 कनाल भूमि है। उक्त भूमि से उनका एक लगाव भी है, क्योंकि उनके पूर्वज उस समय खेती करते थे, जब वहां पर सिर्फ बंजर जमीन और आसपास था। फिर ऐसे माहौल में जब पाकिस्तान की आकारण गोलीबारी आए दिन परेशान करती रहती थी, लेकिन सीमा पर प्रहरी बनकर किसानों ने दुश्मनों की गोलियों का सामना भी किया, कई किसान शहीद भी हुए, सैकड़ों पशु धन का नुकसान भी उठाना पड़ा, तब भी वे वहां इस उम्मीद के साथ डटे रहे कि उक्त भूमि सरकार उनके नाम कर मालिकाना अधिकार दे देगी, क्योंकि जम्मू कश्मीर की पूर्व सरकारों ने ऐसे प्रयास भी किए और एक्ट भी बनाए, जिसका लाभ कुछ किसानों को मिला। बाद में उक्त एक्ट को कोर्ट में चुनौतियां भी दी गई, जिससे जिन किसानों के नाम जमीन मालिकाना अधिकार होना था, वह रह गए और अब मौजूदा सरकार ने खाली कराने का आदेश जारी किया है। आदेश से सिर्फ हीरानगर सीमांत क्षेत्र में करीब एक हजार किसान प्रभावित होंगे। बाक्स----

खुद किसानों ने सरकारी भूमि पर नहीं शुरू की थी खेती

जम्मू कश्मीर में एक ऐसी भी सरकार बनी थी, जिसने बेकार पड़ी जंगल से पटी बंजर भूमि पर आसपास के लोगों को इच्छा से खेती करने की इजाजत दी। अब वर्तमान सरकार 70 साल के बाद उसे अतिक्रमण करार देकर खाली करने का फरमान भेज रही है। वर्ष 1950 में जम्मू कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री स्व. गिरधारी लाल डोगरा, जो प्रदेश के जनप्रिय नेता के रूप में आज भी याद किए जाते हैं, उन्होंने दूसरे गांवों से हजारों किसानों को हीरानगर सीमांत क्षेत्र में उक्त सरकारी भूमि पर खेती करने के लिए भेजा, जिसके बाद कई दूसरे गांवों से किसान पहुंचे और बंजर भूमि को खाली कर उस पर खेती करने लगे। उसके बाद सरकारों ने भी कुछ ऐसे कानून लाए, जिससे उक्त सैकड़ों किसानों को भूमि के मालिक बनने की उम्मीद जगी। वर्ष 1971 में स्व. शेख अब्दुल्ला का कानून और वर्ष 2006 में गुलाम नबी आजाद का रोशनी एक्ट, लेकिन उनका लाभ ज्यादा भू-माफिया को मिला और जो हक रखते थे, उन्हें नहीं मिला। कोट्स---

सरकार का तानाशाही फरमान है, इसके खिलाफ सीमांत क्षेत्र से आंदोलन का बिगुल बज सकता है। सरकार उनकी उस भूमि को छीनने जा रही है, जिसे उन्होंने खून पसीने से बनाया है। आज जब जमीन खेती योग्य बनी तो सरकार मालिक बन रही है, ऐसा नहीं चलेगा। इसके खिलाफ वे आंदोलन में कूदेंगे।

-अशोक शर्मा, प्रधान, पंच एसोसिएशन कोट्स--

सरकार का आदेश सीमांत क्षेत्र के हजारों किसानों को बेरोजगार करने जा रहा है। इसके लिए पार्टी हाईकमान से बात करेंगे और किसानों के हक के लिए आवाज उठानी पड़ी तो वे पीछे नहीं हटेंगे, वे जनप्रतिनिधि पहले, जिन्होंने उन्हें चुना है, इसके लिए सरकार से बात करेंगे।

-कर्ण कुमार, डीडीसी सदस्य, मढ़ीन कोट्स--

ये वे किसान हैं,जो सरहद के प्रहरी भी हैं, जिन्होंने गोलियां भी खाई, शहीद भी हुए और फिर भी वहां डटे रहे, इस उम्मीद के साथ कि सरकार ने उन्हें यहां जमीन दी है, उसे कृषि योग्य बनाकर रोजी रोटी के साधन यहां ही तैयार करने है, चाहे कैसी भी परिस्थिति आए, एक सरकार मालिकाना हक देती है और दूसरी बेदखल कर रही है।

- सुभाष गुप्ता, पूर्व एमएलसी कोट्स---

सरकार के आदेश पर सरकारी भूमि पर से अतिक्रमण को हटाने के लिए नोटिस जारी किए गए है। यह सिर्फ हीरानगर के किसानों को ही नहीं, बल्कि पूरे सब डिवीजन में लागू होगा, जहां भी सरकारी भूमि पर अतिक्रमण हुआ है।

- राकेश शर्मा, एसडीएम, हीरानगर

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