जागरण संवाददाता, कठुआ : शहर के सावन चक के पास वार्ड नंबर 13 में स्थित संकटमोचन शिव मंदिर में महिला मंडली के सहयोग से सात दिवसीय सावन मास की कथा एवं सत्संग का आयोजन किया जा रहा है। वीरवार श्रद्धालुओं को उपदेश देते हुए कथावाचक साध्वी राजेश्वरी जी महाराज ने कहा कि विश्व में फैली कोरोना महामारी के चलते जारी संकट में इंसान को कैसे धैर्य और सहनशीलता के साथ जीना है, इसका एक ही उपाय है कि ईश्वर की भक्ति में अपने आप को समर्पित करो। सनातन धर्म की रक्षा के लिए आने वाली युवा पीढ़ी को धर्म के प्रति जागरूक करें क्योंकि देश की युवा पीढ़ी के हाथों में ही धर्म और देश का भविष्य सुरक्षित है।

सामाजिक कुरीतियों से अपने बच्चों को दूर रखें और ईश्वर के प्रति भक्ति में लीन करें। इसके साथ ही सरकार द्वारा आदेशों का पालन करें। इन सब का पालन करके अपना जीवन सुखमय और शांतिपूर्वक रहेगा। जारी कथा के चलते ये भी बताया गया कि मंदिर में 6 अगस्त, शनिवार को दोपहर 12 बजे दिन में भगवान श्री हनुमान जी की मंत्रोच्चारण के साथ मूर्ति स्थापित होगी। मूर्ति स्थापना कार्यक्रम 4 अगस्त को शुरू हो जाएगा। भगवान शिव को प्रिय है सावन का महीना

कठुआ : संत सुभाष शास्त्री का कहना है कि सावन माह में भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है। इस माह में पड़ने वाले सोमवार 'सावन के सोमवार' कहे जाते हैं, जिनमें महिलाएं विशेषतौर से कुंवारी युवतियां भगवान शिव के निमित्त व्रत आदि रखती हैं।

सावन माह के बारे में पौराणिक कथा है कि सनत कुमारों ने भगवान शिव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा। भगवान भोलेनाथ ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योग शक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के सावन महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया। इसके बाद ही महादेव के लिए यह माह विशेष प्रिय हो गया। एक अन्य कथा के अनुसार मरकंडू ऋषि के पुत्र मारकण्डेय ने लंबी आयु के लिए सावन माह में ही घोर तप कर शिव की कृपा प्राप्त की थी, जिससे मिली मंत्र शक्तियों के सामने मृत्यु के देवता यमराज भी नतमस्तक हो गए थे।

भगवान शिव को सावन का महीना प्रिय होने का अन्य कारण यह भी है कि भगवान शिव सावन के महीने में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे। वहां उनका स्वागत अ‌र्घ्य और जलाभिषेक से किया गया था। माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। भू-लोक वासियों के लिए शिव कृपा पाने का यह उत्तम समय होता है। सावन मास में भगवान शंकर की पूजा परिवार के सदस्यों संग करनी चाहिए। इस माह में भगवान शिव के रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है। इसलिए इस मास में प्रत्येक दिन रुद्राभिषेक किया जा सकता है, जबकि अन्य माह में शिववास का मुहूर्त देखना पड़ता है। भगवान शिव के रुद्राभिषेक में जल, दूध, दही, शुद्ध घी, शहद, शक्कर या चीनी, गंगाजल तथा गन्ने के रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक कराने के बाद बेलपत्र, शमीपत्र, कुशा तथा दूब आदि से शिवजी को प्रसन्न करते हैं। अंत में भांग, धतूरा तथा श्रीफल भोलेनाथ को भोग के रूप में चढ़ाया जाता है।

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