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कुपवाड़ा की महिलाएं बना रही हैं हाथ से तिरंगा, आत्मनिर्भरता की पेश की नई मिसाल; PM मोदी भी कर चुके हैं तारीफ

Published: Mon, 14 Sep 2026 06:29 PM (IST)

भारतीय सेना के सहयोग से कुपवाड़ा की 140 महिलाएं फ्लैग सेंटर में हाथ से तिरंगे बनाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। ...और पढ़ें

कुपवाड़ा की बेटियों के हाथों में तिरंगा, आत्मनिर्भरता की नई उड़ान। फोटो सोर्स- सोशल मीडिया।

कुपवाड़ा की बेटियों के हाथों में तिरंगा, आत्मनिर्भरता की नई उड़ान। फोटो सोर्स- सोशल मीडिया।

HighLights

  1. सेना के सहयोग से कुपवाड़ा की महिलाएं तिरंगे बनाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं

  2. 'फ्लैग वुमन' समूह हाथ से तिरंगे बनाकर आजीविका कमा रहा है

  3. इनके हाथ से बने तिरंगे अब सरकारी ई-मार्केटप्लेस पर सूचीबद्ध हैं

जागरण संवाद केंद्र, बारामूला। एलओसी के करीब कुपवाड़ा की सरजमीं पर कभी सुरक्षा चुनौतियों के बीच जिंदगी गुजारने वाली महिलाओं के हाथ अब तिरंगे में उम्मीद और आत्मनिर्भरता के रंग भर रहे हैं।

भारतीय सेना के सहयोग से त्रेहगाम में स्थापित फ्लैग सेंटर में 140 महिलाएं हाथ से राष्ट्रीय ध्वज तैयार कर अपने परिवारों की आजीविका मजबूत कर रही हैं। इन महिलाओं का समूह अब कुपवाड़ा की फ्लैग वुमन (एफएलडब्लयूओके) के नाम से पहचान बना चुका है।

अप्रैल 2022 में कोापरेटिव सोसाइटी के रूप में शुरू हुई एफएलडब्लयूओके को सेना लगातार सहयोग और प्रोत्साहन दे रही है। सोसाइटी के कुपवाड़ा के विभिन्न हिस्सों में 12 स्किल डेवलपमेंट सेंटर संचालित हैं, जहां 140 महिलाओं को रोजगार मिला है।

इन केंद्रों में तैयार होने वाले तिरंगे की खासियत इसकी बारीक हाथ की कारीगरी है। महिलाओं द्वारा हाथ से सिला गया और क्रूएल-एम्ब्रॉयडरी से तैयार अशोक चक्र इन झंडों को बाजार में उपलब्ध सामान्य राष्ट्रीय ध्वजों से अलग पहचान देता है।

सेना के अनुसार, स्थापना के बाद से एफएलडब्लयूओके ने ‘हर घर तिरंगा’, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे अभियानों के लिए अलग-अलग आकार के 4,500 से अधिक तिरंगे तैयार कर वितरित किए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी ‘मन की बात’ में इन महिलाओं के प्रयास का उल्लेख कर चुके हैं।

अब इन महिलाओं के हुनर को बाजार भी मिल रहा है। उनके उत्पाद सरकारी ई-मार्केटप्लेस पर सूचीबद्ध हो चुके हैं। इससे देशभर से नए ऑर्डर मिलने की संभावनाएं बढ़ी हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता शेख जमशीद के मुताबिक, त्रेहगाम केंद्र से करीब 30 परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है। उनका कहना है कि सेना सीमाओं की रक्षा के साथ महिलाओं को प्रशिक्षण, रोजगार और सुरक्षित मंच उपलब्ध कराने में भी आगे रही है।

मानवाधिकार कार्यकर्ता तौसीफ अहमद वार ने पहल की सराहना करते हुए इसे उत्तरी कश्मीर के अन्य क्षेत्रों तक पहुंचाने की जरूरत बताई। उनके मुताबिक, तिरंगा बनाने वाले इन हाथों को अगर व्यापक बाजार और प्रशिक्षण मिले तो सीमावर्ती इलाकों की सैकड़ों महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकती हैं।