जम्मू, अंचल सिंह। कंक्रीट के बढ़ते जंगल और पेड़ों के होते नाश से डॉ. जफर इकबाल शहर के पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिनके प्रयासों से जम्मू शहर में बायोगैस के यूनिट लगना शुरू हुए हैं। उन्होंने जम्मू नगर निगम के कैटलपांड में पहला बायो गैस शुरू कर दिया है। उनकी प्ररेणा से शहर के दो डेयरी वालों ने इसे बनवा कर शेष डेयरी वालों के लिए मिसाल पेश कर दी है। लोग आगे आने लगे हैं। वो दिन दूर नहीं जब शहर में जगह-जगह गोबर से बायो गैस तैयार होगी और शहर साफ-सुथरा बनेगा।

डॉ. इकबाल मूलत: कश्मीर के उड़ी के रहने वाले हैं। वह पिछले 25 वर्षो से जम्मू में ही रह रहे हैं। उन्हें बचपन से ही साफ-सफाई बहुत पसंद थी। स्कूल पहुंचे तो वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भी स्वच्छता को ही चुना। वो जज्बा उम्र के साथ बढ़ता गया। इसी जज्बे के चलते वह नौकरी लगने के बाद भी इस काम में जुटे रहे। पशुपालन विभाग में रहते उन्होंने विभिन्न गांवों में लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया। वर्ष 2005 में उन्होंने जम्मू शहर के तवी पुल के पार के 75 गांवों में काम किया। लोगों का सहयोग मिलता रहा और उनकी इच्छाएं और मजबूत हो गईं।

वर्ष 2013-14 में उन्हें जम्मू नगर निगम में म्यूनिसिपल वेटनरी ऑफिसर लगाया गया। साथ में हेल्थ आफिसर का अतिरिक्त प्रभार देते हुए उन्हें शहर के 38 वाडरें में सफाई व्यवस्था का जिम्मा मिला। इस दौरान उन्हें अपने मन का काम मिल गया। उन्होंने यहां रहकर कचरे के निस्तारण और इससे खाद बनाने की दिशा में काम शुरू किया। शहर का कैटलपांड उनके अधीन था। जिसमें रोजाना 30 से 35 मवेशी रहते ही हैं। उन्होंने इस गोबर से खाद और गैस बनाने की प्रक्रिया शुरू की। उनकी मंशा तब अधूरी रह गई जब उनका तबादला कर दिया गया। अच्छे प्रयास कभी विफल नहीं जाते। उन्हें रूरल सेनिटेशन विभाग ने विशेष तौर पर बुलाया और यह काम सौंपा। इतना ही नहीं जम्मू के तत्काली जिला आयुक्त सिमरनदीप सिंह ने उन्हें विशेष रूप से बुलाकर कचरे के निस्तारण का काम सौंपा।

कचरा निस्तारण के प्राेजेक्ट शुरू किए

जिला प्रशासन की मदद और उनके प्रयासों से शहर के बाहरी क्षेत्र बिश्नाह के चक लाला और अखनूर के भारदां कलां में कचरा निस्तारण के प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं। इनमें चक लाला का प्रोजेक्ट शुरू हो चुका है। आसपास के गांवों के कचरे को ठिकाने लगाते हुए उससे खाद बनाई जा रही है। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए डा. जफर के प्रयास फलीभूत हुए और कुछ महीने पहले जम्मू नगर निगम के डोगरा हाल स्थित कैटलपांड में बॉयो गैस यूनिट शुरू हुआ। डॉ. जफर बताते हैं कि इस बायो गैस यूनिट से छह घरों के लिए मिथैन गैस मिल रही है। छह घरों के चूल्हे इससे जल पाएंगे। यह हमारा पॉयलट प्रोजेक्ट रहा।

डेयरी वालों को भी कर रहे स्वच्छता के प्रति जागरूक

अब हम शहर के डेयरी वालों को इस प्रोजेक्ट को दिखाकर मिसाल देते हुए समझा रहे हैं कि किस तरह डेयरी से निकलने वाले गोबर का सदुपयोग हो सकता है। एक तरफ मुहल्लों से गंदगी हटेगी तो दूसरी तरफ रसोई में जलाने के लिए गैस मिल जाएगी। मुफ्त में खाद भी मिलेगी। पांच और डेयरी वाले इस काम में जुट गए हैं। उम्मीद है कि एक-दो महीने में उनके युनिट भी शुरू हो जाएंगे। ऐसे ही शहर में 300 से ज्यादा डेयरियों में बायो गैस युनिट लगवा दिए जाएंगे। उन्होंने बताया कि इस युनिट को लगवाने के लिए नगर निगम ने खादी एवं ग्राम उद्योग विभाग से भी बात की है।

यूनिट लगाने वालों को 30 हजार रूपये मिलेंगे

इस प्रोजेक्ट के माध्यम से डेयरी वाले बिजली भी बना सकेंगे। यूनिट लगाने वालों को 30 हजार रुपये मिलेंगे। इसमें उन्हें 13 हजार रुपये की सब्सिडी मिलेगी। शहर के पंजबख्तर मंदिर जिसे रुपयों वाला मंदिर भी कहा जाता है, में भी प्रोजेक्ट निर्माणाधीन है।

करीब दो डेयरी वालों ने लगाए बॉयो गैस यूनिट

डॉ. जफर इकबाल द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यमों से जागरूक करने और अब डोगरा हाल में गोबर से बायो गैस बनाने के यूनिट को देखने के बाद शहर के डेयरी वाले आगे आने लगे हैं। शहर के बूटा नगर और शक्ति नगर में दो डेयरी वालों ने बायो गैस युनिट लगा लिए हैं। इस यूनिट के लगने के बाद उनकी घर की रसोई गैस की जरूरत तो पूरी हुई ही है, गोबर नालियों में जाने से भी रुक गया है। आसपास के लोग भी खुश हैं।

कई घर हो सकेंगे रोशन

जिस डेयरी वाले के पास 35 से 40 मवेशी होंगे, उससे करीब 100 किलोवॉट बिजली उत्पन्न होगी। पांच से दस मवेशियों से भी करीब 10 बल्ब की बिजली पैदा की जा सकेगी। इतना ही नहीं प्रत्येक डेयरी से तीन चार रसोइयों में एलपीजी की जरूरत समाप्त हो जाएगी। 100 डेयरियों में प्लांट लगने से करीब 300 परिवारों को लाभ मिल सकेगा। शहर में 300 से ज्यादा डेयरियां हैं। तीन जानवर हैं तो इससे सुबह-शाम दो-दो घंटे के लिए बायो गैस बन सकती है।

बॉयो गैस यूनिट से लाभ

तराई एवं मैदानी क्षेत्रों में गोबर को उपलों के रूप में सुखा कर ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। इससे गोबर में मौजूद पौधों के लिये पोषणकारी अधिकांश तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। उपला बनाने में प्रतिदिन करीब 1-2 घंटे का समय भी लगता है। अत: खाना पकाने हेतु गोबर के उपलों के स्थान पर गोबर से बायो गैस बना कर इसे ईंधन के रूप में प्रयोग करने से पोषक तत्वों की हानि नहीं होती। 

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Posted By: Rahul Sharma