जम्मू, राहुल शर्मा। जम्मू-कश्मीर में भले ही कुछ तत्व नफरत की दीवार खड़ी कर यहां शांति-भाईचारे को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रहे हों। मगर उत्तर प्रदेश से हर साल आने वाले इस मुस्लिम परिवार की मदद के बिना विजयदशमी पर्व की धूम संभव नहीं है। ये मेहमान मुस्लिम भाई हिंदुओं के साथ मिल कर भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल दे रहे हैं।

पिछले 38 साल से जम्मू-कश्मीर के विभिन्न जिलों के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाने का काम कर रहे इस परिवार के सदस्यों का कहना है कि दहन के दौरान जब वे लोगों के चेहरों पर खुशी देखेंगे तो उनकी मेहनत फलीभूत हो जाएगी ।

पुतला बनाने वाले 40 कलाकारों की टीम के मुखिया डॉ मोहम्मद गयासुद्दीन ने कहा कि जब हमारे द्वारा बनाए गए पुतलों का दहन होता है तो हमें ऐसा महसूस होता है जैसे हमें पुरस्कार मिल गया हो। बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा देश में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे का भी उदाहरण है। लोग जानते हैं कि हम मुसलमान है।

जब हम गीता भवन जम्मू पहुंचते हैं, वे खुली बांहों से स्वागत करते हैं। क्योंकि उन्हें हमारी कला पसंद है। हमारे बनाए हुए पुतले समूचे जम्मू संभाग में दशहरा मैदानों में इस्तेमाल किए जाते हैं। राजौरी, पुंछ, डोडा, किश्तवाड़, कठुआ के दूरदराज के इलाकों के अलावा कश्मीर में भी उनके बनाए पुतलों का दहन होता है। उन्हें यह पुतले बनाने का आर्डर उत्तर प्रदेश में ही मिल जाता है। हम राक्षसों के इन पुतलों को विजयदशमी पर दहन के लिए ही बनाते हैं। वह शायद ऐसे एकमात्र कलाकार होंगे जो अपने उत्पाद का दहन चाहते हैं।

गयासुद्दीन ने कहा कि वह अपने समूचे परिवार व अन्य कलाकारों के साथ एक माह पहले ही जम्मू पहुंच जाते हैं। जम्मू के लोगों से मिलने वाला प्रेम और स्नेह उन्हें हर साल यहां खींच लाता है।

श्रीनगर में भी जाते हैं पुतले

पेशे से हकीम गयासुद्दीन ने कहा कि जब वह अपने गांव में होते हैं तो वह लोगों का इलाज करते हैं। वह 13 साल के थे जब वह अपने पिता के साथ जम्मू शहर में पुतले बनाने के लिये आये थे। अब तो हर साल उन्हें इस दिन का इंतजार रहता है। उन्होंने बताया कि शहर के प्रमुख परेड और गांधीनगर दशहरा ग्राउंड के अलावा वह संभाग स्तर पर पुंछ, राजोरी, सुंदरबनी, नौशेरा, अखनूर, आरएस पुरा, रियासी, उधमपुर, लेह आदि स्थानों के लिए भी पुतले भेजते हैं।

इसमें बड़े आयोजनों के लिए उन्हें 55 से 60 और सामान्य में 25-30 फीट के पुतले तैयार करते होते हैं। पर्व में विघन पैदा न हो इसके लिये एक कारीगर को भी दहन होने तक साथ भेजा जाता है। उन्होंने कहा कि यह व्यवसाय किसी धर्म और जातपात से जुड़ा नहीं है। यहां ऐसे कई हिंदू और मुस्लिम कारीगर हैं जो सालों से पुतलों का निर्माण कर रहे हैं।

असम से बांस, मेरठ से वेस्ट पेपर, दिल्ली से पुराने कपड़े

38 सालों से पुतलों का निर्माण कर रहे गयासुद्दीन ने कहा कि पुतले बनाने के लिये उनकी टीम दिन रात जुटी हुई हैं। पुतलों के लिये निर्माण सामग्री जुटाने में ही एक माह से अधिक का समय लग जाता है। असम से बांस, मेरठ से वेस्ट पेपर, दिल्ली से पुराने कपड़े, सेबा, पेंट आदि मंगवाया जाता है।

यह सामग्री पुतलों का एडवांस आर्डर मिलने के बाद मंगवाई जाती है। विजयदशमी पर्व आस्था से जुड़ी है परंतु पर्यावरण का भी ध्यान रखा जाता है। पुतलों में पहले अधिक बारूद इस्तेमाल हुआ करता था परंतु अब कम किया जाता है। इस साल परेड मैदान पर रावण के पुतले की कमर से चारों ओर विशेष प्रकार के आग के फव्वारे आकर्षण का केंद्र रहेंगे।

Posted By: Rahul Sharma