ऊधमपुर, रोहित जंडियाल : करीब नौ साल पहले कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंकियों को मौत के घाट उतार देश के लिए बलिदान हुए शौर्य चक्र विजेता राजेश्वर सिंह के नाम पर सोमवार को जब हायर सेकेंडरी स्कूल दिहाड़ी का नाम रखा गया तो माहौल गमगीन था। बलिदानी के परिवार वालों के चेहरों पर गर्व की चमक तो थी, लेकिन आंखें नम थीं। बलिदानी की मां सत्या देवी भावुक हो गई थीं। वह बेटे को खोने के गम डूबी नजर आईं। लेकिन उन्हें सुकून इस बात का था कि उनका बेटा लोगों के दिलों में आज भी जिंदा है।

रामनगर के दिहाड़ी क्षेत्र के त्रंगा में 23 मई, 1959 को जन्मे राजेश्वर सिंह के खून में ही देशभक्ति का जुनून था। उनके पिता स्व. बलवान सिंह सेना में कैप्टन के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। पिता को देखकर ही बड़े हुए राजेश्वर सिंह ने दसवीं तक की शिक्षा हायर सेकेंडरी स्कूल दिहाड़ी से ही हासिल की थी। तीन बहनों के इकलौते भाई राजेश्वर सिंह के पिता भी चाहते थे कि उनका बेटा सेना में भर्ती होकर देश सेवा करे। इसीलिए अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद 27 दिसंबर, 1994 में वह सेना में भर्ती हो गए। राजेश्वर सिंह पंजाब रेजीमेंट में भर्ती हुए। ट्र्रेंनग पूरी करने के बाद उन्हें पंजाब रेजीमेंट की 16वीं बटालियन में तैनात किया गया।

राजेश्वर सिंह अपनी जांबाजी से अलग पहचान बनाने लगे थे। साल 2012 में उनकी नियुक्ति कश्मीर के कुपवाड़ा में हो गई। चार सितंबर, 2012 को वह नियंत्रण रेखा पर तैनात थे। पाकिस्तान ने उस दिन रतनाजी नार पोस्ट से भारी गोलाबारी शुरू कर दी। इसमें राजेश्वर सिंह का एक साथी गंभीर रूप से घायल हो गया। अपने साथी को घायल देख उसे बचाने के राजेश्वर सिंह दौर पड़े। उन्होंने सामने से आतंकवादियों को आते हुए देखा।

राजेश्वर सिंह ने वहीं पर मोर्चा संभालते हुए एक आतंकी को ढेर कर दिया। इस दौरान वह खुद भी गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और आतंकियों से लोहा लेते रहे। इसके बाद वह आतंकियों की गोलीबारी में शहीद हो गए, लेकिन जिस तरह से उन्होंने आतंकियों का मुकाबला किया, उससे हर कोई उनकी बहादुरी का कायल हो गया। सरकार ने भी उनकी बहादुरी को देखते हुए मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया। अब सरकार ने उनके नाम पर उसी स्कूल का नाम रखा, जिसमें राजेश्वर सिंह ने पढ़ाई की थी।

मेरा बेटा अब अमर हो गया : सोमवार को जब स्कूल का नाम उनके नाम पर रखा गया तो उनकी मां सत्या देवी भावुक हो गईं। उन्होंने कहा कि राजेश्वर उनका इकलौता बेटा था। आज स्कूल का नाम उसके नाम पर रखा गया है तो इससे बहुत खुश हैं। बेटा अब आंखों के सामने हो न हो, लेकिन उनका लाल अमर हो गया। पीढ़ी दर पीढ़ी अब बेटे की बहादुरी को याद रखेंगे। यह बेटे के लिए बहुत बड़ा सम्मान है।

पत्नी बोलीं- पति के बलिदान होने पर गर्व है : बलिदानी राजेश्वर सिंह की पत्नी सबीता देवी का कहना है कि उन्हें अपने पति के बलिदान होने पर गर्व है। उनकी कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता। लेकिन उनके पति ने देश की रक्षा करते हुए बलिदान हुए थे। आज उसे सभी याद कर रहे हैं। यह सभी के लिए गर्व की बात है। शहीद की बहन मीना देवी ने कहा कि इकलौते भाई के नहीं होने का बहुत गम है, लेकिन खुशी है इस स्कूल ने भाई को अमर कर दिया।  

Edited By: Rahul Sharma