अखनूर (जम्मू), रमन शर्मा: बेटा अस्पताल में था। चिट्ठी आई कि कारगिल में जंग छिड़ चुकी है। परिवार की जिम्मेवारी पत्नी शारदा पर छोड़ उसी वक्त अखनूर के जांबाज दलेर सिंह ने तुरंत अपनी छुट्टी रद करा दी और बिना किसी को बताए सामान पैक कर लिया।

परिवार ने बेटे की हालत बता रोकने का प्रयास किया तो पत्नी की ओर देखकर यही बोले कि तुम परिवार संभालो, मुझे देश बुला रहा है। वही शब्द उनके आखिरी शब्द साबित हुए और उसके बाद पांच जुलाई को उनकी शहादत की खबर आई। कारगिल की चोटी पर दुश्मन के दांत खट्टे करते हुए दिलेर सिंह अपने नाम को सार्थक कुर्बान हो गए। आज दिलेर को किए वादे को याद कर शारदा परिवार और समाज दोनों मोर्चों पर जिम्मेवारी निभा रही हैं।

यह याद करते हुए शारदा भाऊ की आंखें नम हो जाती हैं। चेहरे पर गौरव का भाव और आंखों में ओज लिए वह बात आगे बढ़ाती हैं। छह माह बर्फीले रेगिस्तान सियाचिन की कड़ी चुनौती से जूझने के बाद कुछ दिन पूर्व ही दिलेर भाऊ घर लौटे थे। उनके बिना बताए पहुंचने ने शारदा की खुशी को भी दोगुना कर दिया था। इसी बीच उनका मझला बेटा दीपक बीमार हो गया। उसे जम्मू के अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

एक पल ठहर शारदा बताती हैं कि इसी बीच खबर आई कि कारगिल में जंग छिड़ चुकी है। हवलदार दिलेर ने उस वक्त बस यही कहा कि इस समय देश को मेरी जरूरत है। घरवालों ने बेटे की बीमारी का हवाला दिया पर शारदा पर परिवार व बेटे की जिम्मेवारी छोड़ दिलेर ङ्क्षसह कारगिल रवाना हो गए और जाते समय यह कह गए कि लौट कर आऊंगा, बेटों का ख्याल रखना।

शहादत के पांच दिन बाद आई खबर: वीरनारी शारदा बताती हैं कि युद्ध में भारतीय जवानों की शहादत की खबर सुनती मन घबरा जाता। इसी बीच ऊधमपुर में उत्तरी कमान में तैनात भाई से अनुरोध कि दिलेर सिंह से बात करावा दो। भारतीय सेना ने वक्त और समय निर्धारित किया था। चार दिन बाद मेरी बात दिलेर से होनी थी। पांच जुलाई की सुबह कुछ जवान रात के समय मेरे घर पर आए। मैंने समझा कि शायद पति से बात करवाने के लिए ले जाने आए हैं। मुझे पहले यही बताया कि उन्हें चोट आई है। परिवार को बता दिया कि चोटी पर चढ़ते हुए वह दुश्मन की गोली से एक जुलाई को ही शहीद हो गए थे। इस सदमे को झेल पाना आसान नहीं था पर खुद के साथ परिवार का जिम्मा भी दिलेर उस पर छोड़ गए थे।

आज भी याद है वह पल: शारदा बताती हैं कि वह एक जुलाई को शहीद हो चुके थे पर दुश्मन को ढेर किए बिना शव निकालना संभव नहीं था। पांच जुलाई को तिरंगे में लिपटा शव अखनूर पहुंचा। पांच दिन पहाड़ की चोटी पर पड़ा रहने के कारण शरीर काला पड़ चुका था। 27 वर्ष की उम्र में एक बार ऐसा लगा कि सब लुट चुका है। पर दिलेर को किया वादा याद है। परिवार को संभालने के साथ स्वयं को समाज सेवा में भी लगा लिया।

हादसे में बेटा भी छोड़ गया साथ: वर्ष 2014 में मैंने बेटे की शादी कर दी। घर में खुशियां लौटी, लेकिन भगवान ने मेरी फिर एक बार परीक्षा ली। बेटे की हिमाचल में सड़क हादसे में मौत ने मुझे दहला दिया। उस बहू को संभाला और उसे आगे बढ़ाया। इतना ही नहीं शारदा भाऊ पढ़ी लिखी थी तो भाजपा ने उन्हें जिला विकास परिषद (डीडीसी)की सीट पर अखनूर से टिकट दे दिया और उनके काम को जोरदार समर्थन मिला। 

Edited By: Rahul Sharma