जम्मू, विवेक सिंह। Article 370: 370 के काले अध्याय के खात्मे के तीन माह पूरे हो चुके हैं। जम्मू-कश्मीर में भी शान से तिरंगा फहरा रहा है। उन परिवारों को यह दृश्य सुकून से भर दे रहा है, जिनके अपने इस महान लक्ष्य की पूर्ति के लिए कुर्बान हो गए। आजादी के बाद अपने ही देश में तिरंगा फहराने पर अपनी ही पुलिस ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी, पर न वह झुके और न ही डरे।1953 से लेकर 2008 के तिरंगा आंदोलन में 28 देशभक्त शहीद हुए। आज देश 370 के खात्मे का जश्न मना रहा है, पर उन परिवारों की आंखें आज भी नम हैं। इन आंखों में खुशी भी है कि अब तिरंगा फहराने वालों पर कोई गोलियां नहीं चलाएगा।

तिरंगा आंदोलन 

जम्मू-कश्मीर के संपूर्ण विलय का सपना 66 साल पहले जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी व जम्मू संभाग के हजारों लोगों ने एकसाथ देखा था। इस आंदोलन को 1953 में 15 शहीदों ने अपने खून से सींचा था। यह लोग जब तिरंगा हाथों में ले सड़कों पर उतरे तो जम्मू-कश्मीर की सरकार कांप गई और उसने बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। पुलिस ने अपने ही लोगों पर बंदूकों के मुंह खोल दिए। इन निहत्थे लोगों का कुसूर बस यही था कि वह तिरंगे को ही अपनी आन-बान और शान मानते थे।  

उसके बाद एक बार फिर 2008 में श्री बाबा अमरनाथ भूमि आंदोलन के बहाने तिरंगा फहराया तो 12 लोगों को जान गंवानी पड़ी। देश की आजादी के बाद भी जम्मू-कश्मीर में एक देश-एक विधान-एक निशान का सपना अधूरा था। जम्मू-कश्मीर में 370 का प्रावधान होने के कारण शेष देश से कोई भी बिना अनुमति यहां नहीं आ सकता था। यह व्यवस्था जम्मू के लोगों को मंजूर नहीं थी। ऐसे में 1949 में पंडित प्रेमनाथ डोगरा की कमान में प्रजा परिषद आंदोलन की नींव रखी गई। आंदोलन बढ़ने लगा तो कश्मीर की सरकार हिलने लगी। 

स्वतंत्रता आंदोलन की यादें ताजा

परमिट सिस्टम, 370 खत्म करने की मांग को लेकर हजारों लोग सड़कोें पर उतर आए थे। जम्मू, कठुआ, राजौरी व अन्य जगहों पर मानों एक बार फिर स्वतंत्रता आंदोलन की यादें ताजा हो आई थी। हजारों लोग तिरंगे लिए सड़कों पर उमड़ पड़े। संपूर्ण विलय के आंदोलन को कुचलने के लिए शेख सरकार ने पंडित प्रेमनाथ डोगरा समेत 294 सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया। सामने अंग्रेज नही थे, लेकिन कश्मीर केंद्रित राजनीतिक पार्टियों के माध्यम से पाकिस्तान का हस्तक्षेप शुरू हो गया था।

तिरंगा फहराकर संकल्प 

ऐसे में 370 खत्म कर देश के साथ संपूर्ण विलय की मांग करने वालों को कुचलने के लिए शेख अब्दुल्ला सरकार ने पूरा दम खम लगा दिया। इधर आंदोलन जोर पकड़ रहा था तो उधर1952 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कोलकाता में आरएसएस के कार्यक्रम में तिरंगा फहराकर संकल्प किया था कि जम्मू कश्मीर में एक विधान, एक निशान, एक प्रधान का सपना हर हाल में साकार होगा। आंदोलन को थामने के लिए पुलिस की बर्बर फायरिंग में सत्याग्रह कर रहे पंद्रह लोग शहीद हो गए व करीब दस हजार से अधिक लोगों को जेलों में ठूस कर उन्हें यातनाएं दी गईं थीं।

आज शहीदों की यादगारें जम्मू-कश्मीर के लोगों को याद दिला रही हैं कि अनुच्छेद 370 का वह प्रावधान समाप्त करने व इसका समर्थन करने वाली ताकतों के पतन का मार्ग इन वीर युवाओं ने अपनी कळ्र्बानियों से प्रशस्त किया था। युवा नेता के रूप में प्रजा परिषद के आंदोलन में हिस्सा ले चुके पूर्व केंद्रीय रक्षा राज्यमंत्री चमन लाल गुप्ता का कहना है कि अनुच्छेद 370 का खात्मा जम्मू कश्मीर के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। 

सात युवा हुए शहीद

14 दिसंबर 1952 व 30 जनवरी 1953 को जम्मू के सीमांत गांव ज्योडियां में तिरंगा लेकर सत्याग्रह कर रहे लोगों पर पुलिस की गोलाबारी में सात युवा शहीद हुए। पहले मेला राम व उसके बाद नानक चंद, बसंत चंद, बलदेव सिंह, साइं सिंह, वरयाम सिंह व त्रिलोक सिंह थे। आज सीमांत ज्योड़ियां गांव में उनका शहीद स्थल देशभक्तलोगों के लिए प्रेरणास्रोत है। 

11 जनवरी 1953 को कठुआ के हीरानगर में पुलिस की फायरिंग में क्षेत्र के भीखम सिंह व बिहारी लाल शहीद हो गए। इसके बाद राजौरी जिले के सुंदरबनी में गोलीबारी में बाबा कृष्ण दास, बाबा रमजी दास व बेली राम ने जान की कुर्बानी दी। जम्मू संभाग के रामबन जिले में तिरंगा हाथ में लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस की गोलीबारी में क्षेत्र के शिवाजी, देवी शरण व भगवान दास ने शहादत दी।

23 जून 1953- तिरंगे की शान के लिए लड़ रहे जम्मू वासियों के आंदोलन की कमान करने के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी परमिट सिस्टम तोड़ने जबरन जम्मू-कश्मीर में पहुंचे। उन्हें जम्मू कश्मीर के प्रवेश द्वार लखनपुर में गिरफ्तार किया गया। चंद दिन बाद 23 जून 1953 को जेल में उनका निधन हो गया था। इस आंदोलन में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बहारी वाजपेयी भी शामिल हुए थे।

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Posted By: Babita kashyap

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