जम्मू, अशोक शर्मा : बेशक रविवार को भाई बहन के अटूट प्रेम का पर्व रक्षा बंधन पूरे जोश के साथ मनाया गया लेकिन वृद्ध आश्रम अम्बफला में रहने वाले कई बुजुर्गो की आंखें सुबह से शाम तक अपनों का इंतजार करती रही। हालांकि इन बुजुर्गों ने आश्रम में रह रहे लोगों के साथ रक्षा बंधन का पर्व मनाया और खुशियां मनाते फोटो भी खिंचवाए लेकिन अपनों से अलग रहने की एक टीस उनके चेहरों पर झलकती रही।

बेशक आश्रम में रह रहे अधिकतर बुजुर्गों का कहना था कि जिन लोगों ने उनकी परवाह नहीं की उनसे उनका क्या रिश्ता। कुछ बुजुर्ग बाहर से अपने आप को ठोस दिखाते हुए काफी देर यह दर्शाते रहे कि उन्हें किसी से कोई लेना देना नहीं है। वह यहां हैं, खुश हैं लेकिन कुछ देर बातचीत करने के बाद वह भी अपनी आंखों को छलकने से रोक नहीं सके। भावुक हुई एक बुजुर्ग महिला काल्पनिक नाम संतोष ने कहा कि इस दिन का बचपन से ही बेसब्री से इंतजार रहता था। भाइयों से पहले उठ कर तैयार होकर पूजा पाठ कर भाइयों की लंबी आयु के लिए कामना कर लेने के बाद ही भाइयों को जगाती थी। दिन भर एक मस्ती का आलम रहता था। भाइयों को देख कई-कई सपने संझोए थे। कई-कई दिन पहले राखियां पसंद कर लिया करती। घर वालों से पैसे लेने के बजाए अपने जमा किए हुए पैसों से ही राखी खरीदा करती थी। शादी के बाद भी यह उत्साह बना रहा लेकिन बुजुर्ग होते ही सब रिश्ते नाते हमें भूल गए।

कुछ रिश्तेदार बीच-बीच में मिलने भी आते हैं लेकिन पर्व त्योहार तो उन्हें अपने परिवार के साथ मनाना होता है। अब अकेले ही हर पर्व त्योहार मनाने की आदत सी हो गई है। आश्रम वाले, दूसरे कई सामाजिक संगठन अक्सर पर्व त्योहार पर कोई न कोई कार्यक्रम करते ही रहते हैं लेकिन उससे अपनों की कमी और खलने लगती है।

वहीं एक बुजुर्ग काल्पनिक नाम रत्तो राम ने कहा कि दुख इस बात का है कि जिन बच्चों के लिए दिन रात मेहनत की आज वह पहचानने से इंकार करते हैं। उन्हें लगता है कि उनके बच्चों को अगर पता चलेगा कि उनके बुजुर्ग वृद्ध आश्रम में हैं तो उनकी तोहीन होगी। वहीं वृद्ध आश्रम में रह रहे एक बुर्जुग ने कहा कि उनके पास सब कुछ है लेकिन बच्चे अपने काम को लेकर बाहर चले गए हैं। घरों में अकेले रहना मुश्किल है। ऐसे में उन्होंने अपनी मर्जी से वृद्ध आश्रम में रहने का निर्णय लिया है। अब यहां रहने वाले सभी लोगों के साथ एक अलग ही रिश्ता है। मन की बात भी हो जाती है। दुख दर्द भी साझा हो जाता है। वहीं एक बुजुर्ग ने अपनी कलाई पर बंधी राखियां दिखाते हुए कहा घर में इतनी राखियां किसने बांधनी थी। 

Edited By: Vikas Abrol