जागरण संवाददाता, राजौरी। पुलवामा हमले के शहीद नसीर अहमद के आठ वर्षीय बेटे काशिफ ने कहा कि वह सेना में भर्ती होकर अपने अब्बू की शहादत का बदला जरूर लेगा। मेरे अब्बू बहादुर थे। नसीर की शहादत पर पूरा परिवार गमगीन था। गांव के लोगों को दुख के साथ फख्र भी था।

राजौरी से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित थन्ना मंडी तहसील के दोदासन बाला क्षेत्र में मातम पसरा था। सीआरपीएफ के शहीद हेड कांस्टेबल नसीर अहमद पुत्र स्व. फकर दीन का बेटा काशिफ पिता की फोटो देखकर कभी रोता तो कभी अब्बू, अब्बू करके बेहोश हो जाता है। काशिफ कहता है कि मेरे अब्बू हमले में शहीद हो गए हैं। मैं भी बड़ा होकर आतंकवाद का डटकर मुकाबला करना चाहता हूं। जिन लोगों ने मेरे अब्बू को मारा, उन्हें बिल्कुल नहीं छोडूंगा। मैं एक दिन अपने अब्बू की शहादत का बदला जरूर लूंगा। शहीद की पत्नी व दोनों बच्चे जम्मू में रहते हैं। उन्हें जम्मू से सीआरपीएफ के विशेष वाहन से गांव लाया गया। शहिद नसीर पिछले 22 साल से सीआरपीएफ में कार्यरत थे। शहीद को पूरे सैन्य सम्मान के साथ दोदासन बाला में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह, राज्यपाल के सलाहकार केके शर्मा, भाजपा प्रदेश प्रधान रवीन्द्र रैणा, स्पीकर डॉ निर्मल सिंह सहित अन्य प्रशासिनक अधिकारी श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचे थे।

भाई नहीं बेटे से बढ़कर था नसीर
शहीद नसीर अहमद का भाई सेहराज दीन जो जो पुलिस कांस्टेबल हैं, ने बताया कि नसीर सिर्फ सात साल का था जब उनके पिता का देहांत हो गया था। उन्होंंने ही बच्चों की तरह नसीर को पाल-पोसकर बड़ा किया। वह उनका छोटा भाई नहीं बल्कि बेटा व दोस्त भी था। उनकी पत्नी नसीर को बेटे की तरह प्यार करती थी। वह तो अभी भी यह मानने को तैयार नहीं है कि नसीर उनके बीच नहीं हैं। नसीर अपने पीछे पत्नी शाजिया अख्तर, बेटी फलक और बेटे काशिफ को छोड़ गया है।

जिद करके हुआ था भर्ती
बड़े भाई सेहराज दीन ने कहा कि पिता की मौत के बाद परिवार का पालन-पोषण करने के लिए वह पुलिस में भर्ती हो गए। परिवार की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। नसीर सेना में भर्ती होकर देश सेवा की बात करता तो, वह हर बार घर का हवाला देकर उन्हें भर्ती रैली में जाने से मना कर देते। लेकिन वह अपनी बात पर अड़ा रहा। आखिरकार वह सीआरपीएफ में भर्ती हो गए। सेहराज दीन ने कहा, नसीर ने वीरवार सुबह उनको फोन कर कहा कि उन्हें मामूली बुखार है। एक बार श्रीनगर पहुंच जाऊं वहां जाकर डॉक्टर को दिखाकर दवा लूंगा। उसके बाद हमारा उससे कोई संपर्क नहीं हुआ। मुझे क्या पता था कि नसीर से मेरी अंतिम बार बात हो रही है। क्षेत्र के वरिष्ठ नागरिक निसार राही ने बताया कि नसीर की शहादत के बाद पूरा क्षेत्र दर्द में है। इलाके के लोग उसे कभी नहीं भूल सकते। नसीर युवाओं को नशे की लत में न पडऩे के लिए प्रेरित करता था। सरपंच जहीर अब्बास ने सरकार से गांव में नसीर के सम्मान में एक स्मारक बनाने की अपील की।

युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए करता था प्रेरित
ग्रामीण बताते है कि नसीर अपने परिवार के साथ जम्मू में ही रहता था, लेकिन जब भी वह अपने गांव दोदासन बाला में आता तो गांव के युवाओं को एकजुट करके उन्हें नशे के सेवन से दूर रहने के लिए प्रेरित करता। हमेशा ही नशे से दूर रहो और अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। इसके साथ-साथ वह गांव के हर व्यक्ति के घर में जाकर उनसे मिलता, उनका हालचाल जानकर ही वापस लौटता। शहीद के शव के अंतिम दर्शन करने के लिए गांव में भीड़ उमड़ पड़ी थी।  

Posted By: Preeti jha

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप