जम्मू से विवेक सिंह। पूर्वी लद्दाख में पिछले वर्ष जब चीन ने गुस्ताखी दिखाई और भारतीय सेना ने ड्रैगन के तेवर भांपते हुए युद्धस्तर पर तैयारी आरंभ कर दी। सेना के इंजीनियरों ने हालात को भांपते हुए नियंत्रण रेखा के करीब श्योक नदी पर 72 घंटे में 60 मीटर लंबे पुल का निर्माण कर दिया और अग्रिम मोर्चे पर सेना के वाहन और साजोसामान तीव्र गति से पहुंचने लगे। दुश्मनों के लिए विध्वंसकारी जवानों के हाथ बहुत करीने से निर्माण भी कर सकते हैं।

60 घंटे में 120 फीट लंबा पुल: कश्मीर की लाइफलाइन जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर रामबन के पास एक हिस्सा ढहने से हाईवे बंद हो गया। कश्मीर को राशन, पेट्रोल-डीजल समेत तमाम आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बन गई। हाईवे अथॉरिटी की टीम ने हाथ खड़े कर दिए और निर्माण पूरा करने के लिए कम से कम 20 दिन का समय मांगा। ऐसे में सेना के इंजीनियर जुटे और 60 घंटे में 120 फीट लंबे वैकल्पिक बैली पुल का निर्माण कर दिया। उसके बाद से कश्मीर को तमाम आपूíत सुचारू हो चुकी है और फंसे यात्रियों को भी निकाला जा चुका है।

हश बटन दबाते ही खुलकर बन जाता है पुल। फाइल फोटो

40 दिन में 260 फीट लंबा सस्पेंशन ब्रिज: इसी तरह पिछले वर्ष लद्दाख में 260 फीट लंबा सस्पेंशन ब्रिज 40 दिन में बना दिया था। यह हमारे सेना के इंजीनियरों की करामात है कि वह हर संकट का हल चुटकियों में खोज निकालते हैं। युद्ध व आपात स्थिति में वे सेना की राह को आसान बनाते ही हैं। आम लोगों के लिए भी मददगार बन खड़े हो जाते हैं।

नाव से बना देते हैं पौंटून पुल: सेना के बढ़ते कदम रास्ते में आने वाले नदी, नालों के कारण न रुके, इसके लिए सेना के कांबेट इंजीनियर चंद घंटों में नावों का पुल बनाकर अपने टैंक और बड़े वाहनों को आसानी से गुजार देते हैं। कई बार जब बाढ़ के कारण दरियाओं, नदियों पर बने पुल बह जाते हैं तो आम जनजीवन को सुचारू रखने के लिए सेना की इंजीनियरिंग रेजीमेंट नावों का पुल बनाकर लोगों को राहत देती है। नदी पर सेना द्वारा नावों के पुल को पौंटून पुल कहा जाता है।

बंकर से लेकर हेलीपेड तक बनाते हैं : सेना की इंजीनियरिंग रेजीमेंट युद्ध्, सैन्य अभियानों की कामयाबी के लिए बिना समय गंवाए हेलीपेड से लेकर बंकर तक बनाने की योग्यता रखती है। सेना आगे बढ़ती रहे, इसके लिए सेना के इंजीनियर रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करते जाते हैं। चंद घंटों में सेना की आधुनिक मशीनें पहाड़ी इलाकों में जमीन को समतल कर वहां पर सेना, वायुसेना के हेलीकॉप्टर उतारने के लिए हेलीपेड बना देती हैं। हेलीपैड बनने पर सेना जवानों व हथियारों को तेजी से मौके पर पहुंचाकर दुश्मन के मंसूबों को नाकाम बनाती है। इसके साथ इंजीनियरिंग रेजीमेंट जवानों के लिए बिजली, पानी जैसी सुविधाओं का भी बंदोबस्त करती है।

चंद मिनटों में तलाश लेते हैं बारूदी सुंरग : दुश्मन कई बार सेना को रोकने के लिए रास्ते में बारूदी सुरंगें बिछा देता है। ऐसे में सेना के इंजीनियर आगे रहकर दुश्मन की बारूदी सुरंगे तलाशकर सुनिश्चित करते हैं कि जवानों व साजो सामान को किसी प्रकार का कोई नुकसान न हो। इंजीनियरों द्वारा हरि झंडी देने के बाद ही सेना आगे कूच करती है। इसके साथ ही वे अपने इलाके में दुश्मन की घुसपैठ को रोकने के लिए भी बंदोबस्त करते हैं।

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