जम्मू, रोहित जंडियाल । करीब 10 साल से जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर रामबन में ट्रामा सेंटर के दरवाजे 24 घंटे खुले जरूर हैं, लेकिन यहां जान बचाने के लिए इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचना बेमानी होगी। यह बात इतनी जगजाहिर हो चुकी है कि सड़क हादसे में घायल कोई भी व्यक्ति इस ट्रामा सेंटर में जाने से कतराने लगता है।

इस ट्रामा सेंटर का नाम सुनते ही उसे इलाज मिलने की जगह जान गंवाने का भय सताने लगता है। दरअसल, इस ट्रामा सेंटर में सुविधाओं के नाम पर सिर्फ दो मेडिकल आफिसर हैं। करीब एक करोड़ 88 लाख रुपयों की लागत से बना यह सेंटर शोपीस बनकर रह गया। तभी तो इस क्षेत्र में कोई सड़क दुर्घटना होती है तो घायलों को ट्रामा सेंटर नहीं, बल्कि जिला अस्पताल रामबन में लाया जाता है। वहां से गंभीर घायलों को राजकीय मेडिकल कालेज जम्मू में भेज दिया जाता है।

जम्मू से श्रीनगर जाते समय ऊधमपुर के बाद बनिहाल तक के लंबे 95 किलोमीटर राजमार्ग पर रामबन में ही इकलौता ट्रामा सेंटर है, लेकिन इस ट्रामा सेंटर की शुरू से ही अनदेखी की गई। कई सालों तक तो यहां के लिए पद ही सृजित नहीं हुए। दो वर्ष पहले तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने इस ट्रामा सेंटर को शुरू करने के लिए प्रशासनिक परिषद की बैठक में 34 पद सृजित किए गए। इनमें एक पद सर्जन, एक फिजिशयन, एक गायनोकालोजिस्ट, एक बाल रोग विशेषज्ञ, एक एनेस्थीसिया विशेषज्ञ, एक नेत्र रोग विशेषज्ञ, एक आर्थोपैडक्स विशेषज्ञ और एक रेडियालोजिस्ट का पद शामिल है। तीन पद मेडिकल आफिसर्स के भी रखे गए। इसके अलावा लैब टेक्निशयन के दो पद, जूनियर नर्स के सात पद, एक्स-रे असिस्टेंट के दो पद, लैब असिस्टेंट के दो पद, थियेटर असिस्टेंट के दो पद, वार्ड ब्वाय के दो और नर्सिंग अर्दली के चार पद भी सृजित किए गए, लेकिन इनमें से किसी भी पद पर नियुक्ति नहीं हुई। अब दो मेडिकल आफिसर्स के पदों पर जरूर नियुक्ति हुई है।

वोहरा के निर्देश, विधानसभा में हंगामा और हाईकोर्ट का दखल, फिर भी ढाक के तीन पात

पूर्व राज्यपाल एनएन वोहरा ने साल 2015 में निर्देश दिए थे कि रामबन के ट्रामा सेंटर को तय समय पर शुरू किया जाए, लेकिन कुछ नहीं हुआ। बाद में भाजपा-पीडीपी सरकार के दौरान विधानसभा में इस सेंटर को शुरू ने किए जाने पर हंगामा हुआ। फिर भी कुछ हासिल नहीं हुआ। पिछले साल हाई कोर्ट ने सरकार से इस सेंटर को शुरू करने पर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया। इसके बाद दो डाक्टरों की नियुक्ति तो हो गई, लेकिन अभी भी यह विशेषज्ञ डाक्टरों की राह ताक रहा है।

एक दशक में आठ सौ अधिक मौतें

रामबन जिला पुलिस के अनुसार बनिहाल से चंद्रकोट के बीच एक दशक में 858 लोगों की सड़क हादसों में मौत हुई है। इसी इलाकों में सबसे ज्यादा सड़क हादसे भी होते हैं। भूस्खलन भी इसी इलाके में अधिक होते हैं। पहाड़ी से मलबा गिरने के कारण राजमार्ग खतरनाक हो जाता है। राजमार्ग पर फिसलन बढ़ जाती है। ऐसे हालात में जरा सी चूक होने पर सड़क हादसा हो जाता है। अगर ट्रामा सेंटर सही से काम कर रहा होता तो कई घायलों को समय पर उचित इलाज मिलता और जान बच जाती।

जिस उद्देश्य से यह ट्रामा सेंटर बनाया गया, उसे पूरा नहीं किया जा सका है। यहां विशेषज्ञ डाक्टर न होने के कारण ही इसे सही तरीके से शुरू नहीं किया जा सका है। कई बैठकों में इसका जिक्र हुआ है। प्रशासन को इसकी पूरी जानकारी है, लेकिन कोई भी कुछ नहीं कर रहा है।

-डा. फरीद, मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी, रामबन