कब है दुर्गाष्टमी, नवमी? यहां दूर करें कंफ्यूजन, जानें जम्मू में कन्या पूजन और साख विसर्जन का शुभ समय
Sharadiya Navratri: ज्योतिषाचार्य महंत रोहित शास्त्री ने शारदीय नवरात्रि में दुर्गाष्टमी, महानवमी और विजयदशमी की तिथियों को लेकर स्पष्ट जानकारी दी है।

अष्टमी-नवमी की तारीखों से लेकर दशहरे का शुभ समय।
HighLights
अष्टमी 19 अक्टूबर को, नवमी और दशहरा 20 अक्टूबर को।
कन्या पूजन और साख विसर्जन 19 या 20 अक्टूबर को।
विजयदशमी शस्त्र पूजन 20 अक्टूबर दोपहर 12:52 बजे के बाद।
जागरण संवाददाता, जम्मू। नवरात्रि के समापन पर दुर्गाष्टमी, महानवमी और विजयदशमी की तिथियों को लेकर असमंजस के बीच श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष और ज्योतिषाचार्य महंत रोहित शास्त्री ने पंचांग के अनुसार जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि सूर्योदय व्यापिनी अष्टमी 19 अक्टूबर, सोमवार और नवमी 20 अक्टूबर, मंगलवार को मनाई जाएगी। विजयदशमी यानी दशहरा भी 20 अक्टूबर को होगा।
आश्विन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर को सुबह 8 बजकर 29 मिनट से शुरू होकर 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। नवमी तिथि 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 53 मिनट से शुरू होकर 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 51 मिनट तक रहेगी।
19 अक्टूबर को अष्टमी और 20 को नवमी का पूजन
शास्त्री ने बताया कि अष्टमी पर व्रत, पूजन, साख विसर्जन और कन्या पूजन करने वाले श्रद्धालु 19 अक्टूबर को अनुष्ठान कर सकते हैं। नवमी पर व्रत और कन्या पूजन सहित अन्य धार्मिक कार्य 20 अक्टूबर को किए जा सकते हैं।
भक्त अपनी पारिवारिक और धार्मिक परंपराओं के अनुसार अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन और साख विसर्जन करते हैं। निर्धारित तिथि पर अनुष्ठान न हो पाने पर परंपरा और पंचांग के अनुसार विद्वानों से मार्गदर्शन लेने की सलाह दी गई है।
दशहरा पर दोपहर 12.52 बजे के बाद शस्त्र पूजन
विजयदशमी पर शस्त्र पूजन 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 52 मिनट के बाद करना शुभ रहेगा। पूजन के समय में स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा का ध्यान रखने को कहा गया है।
कन्या पूजन नवरात्रि का महत्वपूर्ण अनुष्ठान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तीन से नौ वर्ष तक की कन्याएं मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की प्रतीक मानी जाती हैं। पूजन में उनके पैर धोकर तिलक लगाया और मौली बांधी जाती है, फिर भोजन कराया जाता है। परंपरा के अनुसार नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भी भोजन कराया जाता है। इस अवसर पर हलवा, पूड़ी, खीर और काले चने बनाए जाते हैं। भोजन के बाद उपहार या दक्षिणा देकर आशीर्वाद लिया जाता है।
राशि के अनुसार दान की परंपरा
शास्त्री के अनुसार श्रद्धालु चंद्र राशि के अनुसार दान कर सकते हैं। मेष के लिए लाल वस्त्र, गुड़ या नारियल; वृष के लिए चावल, चीनी या सफेद वस्त्र; मिथुन के लिए हरे वस्त्र, मूंग दाल या हरे फल; कर्क के लिए चावल, दूध या सफेद वस्त्र बताए गए हैं।
सिंह के लिए गुड़, घी या लाल चुनरी; कन्या के लिए हरे वस्त्र या पुस्तकें; तुला के लिए सफेद वस्त्र, चावल या आटा; वृश्चिक के लिए लाल वस्त्र, लाल चुनरी या गुड़ दान किया जा सकता है। धनु के लिए पीले वस्त्र, हल्दी या केले; मकर के लिए नीले वस्त्र या चांदी के सिक्के; कुंभ के लिए नीले वस्त्र या चांदी के कंगन; मीन के लिए पीले वस्त्र या हल्दी की परंपरा बताई गई है। दान अनिवार्य नहीं है; श्रद्धालु सामर्थ्य के अनुसार कोई एक वस्तु दे सकते हैं। वस्तु के मूल्य से अधिक महत्व श्रद्धा और सद्भावना का है।
अनुष्ठान के बाद करें व्रत पारण
कन्या पूजन और अन्य अनुष्ठानों के बाद व्रत का पारण किया जाता है। उचित समय के लिए पारिवारिक परंपरा, धार्मिक मान्यताओं और पंचांग का पालन करने की सलाह दी गई है।
