जम्मू, जागरण संवाददाता । झुग्गी झोंपड़ी के ऐसे बच्चे जिनके लिए पढ़ाई लिखाई एक सपने से कम नहीं। ऐसे बच्चे जो दिव्यांग होने के कारण अपने आप को अलग-थलग समझते हैं। उन्हें मुख्य धारा पर लाने में लगी हैं संध्या धर।अपनी लगन और मेहनत से इन बच्चों के जीवन को निखारने में जुटी संध्या धर इतना काम करती हैं कि एक स्वस्थ आदमी भी इतना काम करने की हिम्मत शायद ही जुटा सके।संध्या स्वयं चल नहीं सकती। मात्र दायां हाथ ही काम करता है। जिसके बल पर उन्होंने एमकॉम की और अपने दम पर सरकारी नौकरी कर रही हैं। इस नौकरी से जो पैसा मिलता है। उससे एक संस्थान जम्मू इंस्टीट्यूट आफ जनरल एजुकेशन एंड रिहेवलीटेशन (जिगर) चला रही हैं।

इंस्टीट्यूट में इस समय 75 बच्चों को 11वीं तक की पढ़ाई करवा रही हैं। संध्या जब स्वयं पढ़ भी रही थी तो करीब 20 वर्षो तक अपने घर में ही बेसहारा गरीब बच्चों को निशुल्क पढ़ाती रही। संध्या सिर्फ झुग्गी झोंपड़ी के बच्चों को पढ़ाती ही नहीं। दिव्यांग बच्चों की हर सहायता के लिए भी तत्पर रहती हैं। हर वर्ष दिव्यांग बच्चों के लिए शिविर का आयोजन किया जाता है। उस शिविर में दिव्यांग लोगों को व्हील चेयर, नेत्रहीन बच्चों को टाॅकिंग केलकुलेटर और उनकी जरूरत की चीजें वितरित की जाती हैं। पिछले चार वर्षो से संध्या नियमित इस तरह के कैंप आयोजित करती आ रही हैं। वह कहती हैं इस कार्य के लिए उन्हें लोगों का भी सहयोग मिल रहा है। जितने पैसे कम पड़ जाते हैं वह अपने से खर्च कर लेती हैं। इन दिनों संध्या अपने साथियों के साथ आयुष्मान भारत के कार्ड बनवाने में लगी हुई हैं।

इसी तरह लॉक डाउन के दौरान करीब 15 सौ लोगों में राहत सामग्री वितरित की।संध्या का मानना है कि दिव्यांग लोगों के लिए हकूक तो बहुत हैं लेकिन इसकी जानकारी का पीडि़तों को भी अभाव है और आम जनता भी इसके बारे में न के बराबर ही जानती है। लोगों में दिव्यांगों के हक के प्रति जागरूकता के लिए विभन्न कालेजों, संस्थानों में वह अब तक 11 सेमीनार करवा चुकी हैं। हर वर्ष दिव्यांग दिवस पर किसी रोल मॉडल को सम्मानित करती हैं। दिव्यांग बच्चों द्वारा तैयार सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए जाते हैं।इन कार्यक्रमों के आयोजन का उद्देश्य भी यही है कि दिव्यांग बच्चों में एक विश्वास जगाया जाए कि वह किसी से भी कम नहीं हैं। संध्या मानती है कि जिस तरह उन्हें घर परिवार, मित्रों, रिश्तेदारों का सहयोग मिला और वह आज कुछ करने के काबिल हुई हैं। उसी तरह अगर दूसरे दिव्यांग बच्चों का भी कोई हाथ थामने वाला हो तो वह भी किसी से कम नहीं। मौके मिलते रहें तो वह भी देश की उन्नति में पूरा योगदान देने की हिम्मत रखते हैं।

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