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जम्मू-कश्मीर में सीमा से कई किलोमीटर अंदर तक कैसे पहुंच रहे ड्रोन? आरएसपुरा में बार-बार हेरोइन मिलने से उठे सवाल

Published: Wed, 21 Oct 2026 06:58 PM (IST)

आरएसपुरा के सीमांत क्षेत्र में खेतों से बार-बार हेरोइन के पैकेट मिलना सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है। ड्रोन ...और पढ़ें

आरएसपुरा में बार-बार हेरोइन बरामदगी से सुरक्षा एजेंसियों की चुनौती बढ़ी। (फाइल फोटो)

आरएसपुरा में बार-बार हेरोइन बरामदगी से सुरक्षा एजेंसियों की चुनौती बढ़ी। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. आरएसपुरा में खेतों से बार-बार हेरोइन के पैकेट बरामद।

  2. ड्रोन के जरिए भारतीय सीमा में नशे की खेप पहुंच रही।

  3. सुरक्षा एजेंसियों के सामने तस्करों का नेटवर्क चुनौती।

दलजीत सिंह, आरएसपुरा। भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बावजूद आरएसपुरा के सीमांत क्षेत्र में खेतों से बार-बार हेरोइन के पैकेट बरामद होना सुरक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती बनता जा रहा है। मंगलवार रात गांव मुले चक तलाड़ के पास धान के खेत से हेरोइन के तीन पैकेट मिलने की घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि सीमा पार से कथित तौर पर ड्रोन के जरिए भेजी जा रही नशे की खेप भारतीय क्षेत्र में कई किलोमीटर अंदर तक कैसे पहुंच रही है। जिस स्थान से ताजा खेप बरामद हुई, वह अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगभग चार-पांच किलोमीटर अंदर बताया जा रहा है।

ऐसे में यह जांच का अहम विषय है कि क्या ड्रोन इतनी दूरी तय कर खेप गिराने के बाद वापस लौट रहे हैं और यदि ऐसा है, तो उनकी गतिविधियों का समय रहते पता लगाने में क्या चुनौतियां आ रही हैं। आरएसपुरा सेक्टर में यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ समय के दौरान सीमावर्ती इलाकों में अलग-अलग स्थानों से हेरोइन की खेप बरामद होने के मामले सामने आ चुके हैं।

इन घटनाओं में ड्रोन के जरिए नशीले पदार्थ गिराए जाने की आशंका भी जताई गई। बार-बार सामने आ रही ऐसी घटनाएं इस संभावना की ओर ध्यान दिलाती हैं कि सीमा पार बैठे तस्कर नशे की खेप भारतीय क्षेत्र में पहुंचाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल करने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर उसे प्राप्त करने वाले लोगों से भी संपर्क बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, सभी मामलों के आपस में जुड़े होने की पुष्टि नहीं हुई है।

पहले भी खेतों से मिली थी नशे की खेप

27 अक्टूबर 2025: आरएसपुरा सेक्टर में बीओपी जतिंदर के पास सीमा सुरक्षा बल और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई के दौरान दो बैगों से लगभग 5.3 किलोग्राम हेरोइन बरामद की गई थी। इस मामले में भी सीमा पार से ड्रोन के जरिए खेप गिराए जाने की आशंका जताई गई थी।

14 फरवरी 2026: क्षेत्र के नई बस्ती करोटाना में गेहूं के खेत से दो पैकेट बरामद किए गए थे। इनमें लगभग 6.582 किलोग्राम हेरोइन जैसी सामग्री मिली थी। इसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करीब 40 करोड़ रुपये बताई गई थी। अधिकारियों ने इस खेप के ड्रोन से गिराए जाने की आशंका जताई थी।

14 मार्च 2026: आरएसपुरा सेक्टर में फ्लोरा और सुचेतगढ़ के बीच कृषि भूमि से करीब 503 ग्राम हेरोइन बरामद होने की खबर सामने आई थी। यह बरामदगी भी सीमांत क्षेत्र में नशे की तस्करी को लेकर चिंता बढ़ाने वाली घटनाओं में शामिल रही।

इन घटनाओं के बाद अब मुले चक तलाड़ के पास खेत से तीन पैकेट मिलना यह सवाल उठाता है कि नशे की खेप गिराने वालों और उसे आगे पहुंचाने वालों की पहचान करने के लिए निगरानी तंत्र को किस तरह और प्रभावी बनाया जा सकता है।

केवल खेप बरामद करना काफी नहीं

सीमा पार से ड्रोन के जरिए नशीले पदार्थ गिराए जाने की आशंका वाले मामलों में चुनौती केवल पैकेट बरामद करने तक सीमित नहीं है। यह पता लगाना भी जरूरी है कि खेप भेजने वाले कौन हैं, भारतीय क्षेत्र में उसे प्राप्त करने के लिए कौन सक्रिय है और क्या अलग-अलग घटनाओं में कोई साझा नेटवर्क काम कर रहा है।

यदि खेप गिराने के बाद उसे उठाने वाले लोग पहले से तय स्थान पर पहुंच जाते हैं, तो यह सीमा पार बैठे तस्करों और स्थानीय संपर्कों के बीच संभावित तालमेल की ओर संकेत कर सकता है।

हालांकि, इसकी पुष्टि प्रत्येक मामले की जांच के आधार पर ही हो सकती है। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस प्रशासन के लिए जरूरी है कि सीमांत गांवों तथा कृषि क्षेत्रों में संदिग्ध ड्रोन गतिविधियों की निगरानी, स्थानीय खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान और नशे की खेप प्राप्त करने वाले संभावित नेटवर्क की पहचान पर विशेष ध्यान दिया जाए।

नेटवर्क की पहचान बड़ी चुनौती

ड्रोन की गतिविधियों का पता लगाने वाली तकनीकी व्यवस्था की प्रभावशीलता की समीक्षा करना भी अहम हो सकता है, ताकि किसी संदिग्ध गतिविधि की समय रहते पहचान की जा सके। आरएसपुरा के सीमांत क्षेत्र में बार-बार सामने आ रही ऐसी घटनाएं बताती हैं कि नशे की तस्करी पर रोक लगाने के लिए बरामदगी के बाद की कार्रवाई के साथ-साथ तस्करी के पूरे नेटवर्क को समझना भी जरूरी है।

अब सवाल यह है कि खेतों तक पहुंच रही इन खेपों के पीछे सक्रिय लोगों की पहचान करने और ऐसी घटनाओं को दोबारा होने से रोकने के लिए सुरक्षा एजेंसियां और पुलिस प्रशासन निगरानी व्यवस्था को कितना प्रभावी बना पाते हैं।