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सिंधु जल संधि पर पाक को फिर झटका, अब पाकिस्तान नहीं जाएगा ग्लेशियर का पानी; सो कार झील को मिलेगा पुनर्जीवन

Published: Mon, 14 Sep 2026 08:33 PM (IST)

लद्दाख की ऐतिहासिक सो कार झील को पुनर्जीवित करने के लिए एक महत्वाकांक्षी जल प्रबंधन परियोजना शुरू की गई है। ...और पढ़ें

सिंधु नदी और सो कार झील। फाइल फोटो

सिंधु नदी और सो कार झील। फाइल फोटो

रोहित जांडियाल, जम्मू। सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान को फिर झटका दिया गया है। लद्दाख में सिंधु नदी में बह रहे ग्लेशियर के पानी से सूख रही एतिहासिक सो कार झील को पुनर्जीवन मिलेगा। अब तक यह पानी सिंधु के रास्ते पाकिस्तान बह जाता था।

उपपराज्यपाल वीके सक्सेना ने झील के संरक्षण के लिए महत्वाकांक्षी जल प्रबंधन परियोजना की शुरुआत की है। यह कदम पर्यावरण संरक्षण और जल सुरक्षा की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक दशक में जलवायु परिवर्तन के कारण यह झील अपना करीब 70 प्रतिशत आकार खो चुकी है।

परियोजना के तहत अब 18 हजार फीट की ऊंचाई पर रुपशो खारनाक ग्लेशियर की जलधारा को सो कार झील तक पहुंचाया जाएगा। बता दें कि यहां गर्मियों में तापमान 10 डिग्री से नीचे रहता है और सर्दियों में माइनस 20 से 30 डिग्री तक पहुंच जाता है।

लेह से 150 किमी और मनाली से 360 किमी दूर

इस परियोजना से चरागाह दोबारा हरे-भरे होंगे और स्थानीय आजीविका भी सुधरेगी। झील लद्दाख की रूपशु घाटी में है, जो मनाली-लेह राजमार्ग के पूर्व में, तागलांग-ला से ठीक पहले है। यह लेह से 150 किमी और मनाली से 360 किमी दूर है। यह खारे पानी की झील है और इसकी लंबाई लगभग सात किलोमीटर और चौड़ाई दो किलोमीटर से अधिक है।

यह झील लगभग 14,850 फीट की ऊंचाई पर है। अधिकारियों के अनुसार, जल प्रबंधन के अभाव में लगभग 11 हजार एकड़ में फैली यह झील अब सिकुड़कर महज करीब 3,200 एकड़ में रह गई है। झील के सिकुड़ने से यहां आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या में भी भारी कमी आई। उपराज्यपाल सक्सेना ने 10 अगस्त को दौरे के दौरान स्थानीय ग्रामीणों से झील की स्थिति की जानकारी ली थी।

कभी यह क्षेत्र विशाल झील के कारण स्थानीय नमक व्यापार का प्रमुख केंद्र था, लेकिन कुछ वर्षों में इसके तेजी से सूखने से चरागाह और पक्षियों का आवास प्रभावित हुआ है। ग्लेशियर की जलधारा को झील तक पहुंचाने के लिए तीन प्राकृतिक जलाशयों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

पानी को सीधे झील में पहुंचाया जाएगा

पहला जलाशय करीब 270 एकड़, दूसरा 24 एकड़ और तीसरा 10 एकड़ क्षेत्र में फैला है। प्रत्येक जलाशय के निकास पर तीन आरसीसी पाइप के साथ चेक डैम बनाया जाएगा, जिससे जलप्रवाह और जलस्तर को नियंत्रित किया जा सके। तीसरे जलाशय से झील की दूरी 400 मीटर है। यहां से पानी को सीधे झील में पहुंचाया जाएगा।

खास बात यह है कि बड़े कंक्रीट चैनल के निर्माण के बजाय कम लागत वाले साधारण मिट्टी के चैनल और प्राकृतिक ढलान का इस्तेमाल किया जा रहा है। नौ सितंबर से रुपशो खारनाक ग्लेशियर से करीब 20 क्यूसेक पानी पहले जलाशय में सफलतापूर्वक डायवर्ट किया जा रहा है।

चार दिन में यह जलाशय 20 प्रतिशत भर चुका है। पानी को ग्लेशियर से पुराने चैनल और मिट्टी से बने मार्ग के जरिए लाया जा रहा है। यह कंक्रीट चैनल वर्ष 1995 से उपयोग में नहीं था।

पश्मीना पशुपालकों को मिलेगा फायदा

झील से स्थानीय लोगों की आजीविका पर सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है। झील के आसपास रहने वाले ग्रामीण पश्मीना बकरी पालन पर निर्भर हैं। झील के सिकुड़ने के साथ चरागाह भी कम हो गए हैं। इस कारण कई पशुपालकों को चारे के लिए 50 से 75 किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है।

झील के पुनर्जीवन से आसपास के क्षेत्रों में फिर से चरागाह विकसित होने की उम्मीद है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार तथा आजीविका के नए अवसर भी पैदा होंगे।

तीन नए मीठे पानी के वेटलैंड विकसित

परियोजना से तीन नए मीठे पानी के वेटलैंड विकसित होंगे। तीनों जलाशयों में करीब 12,300 लाख लीटर पानी जमा होने की क्षमता होगी। इन प्राकृतिक जल निकायों में ग्लेशियर से आने वाली तलछट पहले ही बैठ जाएगी, जिससे अपेक्षाकृत साफ पानी झील तक पहुंचेगा।

प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि नए वेटलैंड प्रवासी पक्षियों के लिए नए आवास तैयार करेंगे। लेह-मनाली हाईवे से दिखाई देने वाले ये जलाशय भविष्य में नए पर्यटन स्थलों के रूप में भी विकसित हो सकते हैं।

प्रशासन का अनुमान है कि ग्लेशियर के पिघलने से उपलब्ध पानी का पूरी तरह उपयोग करने से झील को एक वर्ष में उसके पुराने स्वरूप को बहाल किया जा सकता है।