श्रीनगर, राज्य ब्यूरो : वाकई, कश्मीर बदल रहा है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द के कश्मीर दौरे का आज चौथा और अंतिम दिन है। आज वह दिल्ली भी लौट जाएंगे, लेकिन ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में ही नहीं बल्कि समूची वादी में कहीं भी तनाव, हड़ताल, बंद और भारी सुरक्षा बंदोबस्त नजर नहीं आया, जो पहले किसी अति विशिष्ट व्यक्ति के कश्मीर आगमन पर नजर आता था। आज सब कुछ आम दिनों की तरह की सामान्य है। नये जम्मू कश्मीर की शांति को भंग करने की अब अलगाववादी खेमा जुर्रत नहीं करता। वाकई, यह अनुच्छेद 370 और 35-ए हटने का ही असर है।

राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द बीते रविवार को श्रीनगर पहुंचे थे। मंगलवार को उन्होंने कश्मीर विश्वविद्यालय के 19वें दीक्षा समारोह में भाग लेते हुए 84 मेधावी छात्रों को सम्मानित किया। यह समारोह डल झील में स्थित शेरे कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंंशन सेंटर (एसकेआइसीसी) में आयोजित किया गया। इससे पूर्व सोमवार को वह बारामुला और गुलमर्ग में भी गए थे।

विश्वविद्यालय में पहले ऐसी थी स्थिति :

कश्मीर विश्वविद्यालय के दीक्षा समारोह में राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द के शामिल होने को लेकर सभी की नजरें इस समारोह और विश्वविद्यालय की गतिविधियों पर टिकी हुई थीं। कश्मीर विश्वविद्यालय कभी अलगाववादी गतिविधियों का जबरदस्त अखाड़ा रहा है। परिसर में कई बार राष्ट्रगान को लेकर विवाद पैदा हुआ है। छात्र ही नहीं, कई बार प्रोफेसरों ने भी राष्ट्रगान की मर्यादा का उल्लंघन किया है और वह भी तब जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के समारोह या सेमीनार हुआ करते थे। जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल एनएन वोहरा की उपिस्थिति में भी ऐसा हुआ था। परिसर में तिरंगा लहराने पर भी विवाद हो जाता था। परिसर में अलगाववादी समर्थक छात्रों को अलगाववादी विचाराधारा के पोषक रहे कई प्रोफेसरों का भी समर्थन रहता था। ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती थी।

कभी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के आगमन पर बंद रहता था कश्मीर :

वर्ष 2009 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी और उसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. प्रणब मुखर्जी कश्मीर विश्वविद्यालय के दीक्षा समारोह में शामिल होने आए थे। दोनों ही बार न सिर्फ कश्मीर विश्वविद्यालय परिसर के भीतर छात्रों और अध्यापकों के एक वर्ग ने उनका विरोध जताया था बल्कि बाहर अलगाववादिदयों ने उनके आगमन पर दो दिन कश्मीर बंद का एलान किया था। विश्वविद्यालय परिसर में तथाकथित एक छात्र गुट ने तो दीक्षा समारोह के बहिष्कार का एलान करते हुए अन्य छात्रों से कहा था कि उन्हेंं हिंदुस्तान के उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति से डिग्री नहीं लेनी चाहिए। प्रणब मुखजी 2012 में 26 सितंबर से 28 सितंबर तक कश्मीर में रुके थेे। आजकल बिस्तर पर पड़े कट्टरपंथी सैयद अली शाह गिलानी समेत तमाम अलगाववादी खेमे ने उस समय कश्मीर बंद का एलान किया था। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भी 2008 में जब कश्मीर आईं तो हड़ताल का एलान हुआ और पूरे कश्मीर में जबरदस्त सुरक्षा प्रबंध रहे थे। बुल्वोर्ड रोड, गुपकार रोड, एसकेआइसीसी जैसे इलाके पूरी तरह सैन्य छावनी जैसे थे। वह अपने परिजनों संग जब पहलगाम गईं तो वहां भी सुरक्षा का पूरा तामझाम नजर आया था। उनकी सुरक्षा में श्रीनगर में करीब 700 सुरक्षाकर्मी लगाए गए थे।

अब न कोई तनाव, न भारी सुरक्षा इंतजाम :

जम्मू कश्मीर पुलिस के सिक्योरिटी विंग में एससएपी रैंक के एक अधिकारी ने कहा कि मैं 20 साल से पुलिस में हूं और अधिकांश समय कश्मीर में ही आतंकरोधी अभियानों या पुलिस विभाग के विभिन्न विंगों में तैनात रहा हूं। मैं तीन बार कश्मीर में राष्ट्रपति के दौरे के समय ड्यूटी दे चुका हूं और पहली बार मैंने इस बार पहले की तरह तनाव को महसूस नहीं किया है। सुरक्षा का बंदोबस्त आम दिनों की तरह ही है। पहले की तरह किसी जगह निषेधाज्ञा का सहारा नहीं लिया गया। एहतियातन गिरफ्तारियों का सिलसिला भी देखने को नहीं मिला। अगर डल झील के साथ सटे बुल्वोर्ड रोड को छोड़ दिया जाए तो किसी भी जगह आम आवाजाही पर कोई रोक-टोक नहीं है।

इस बार नहीं आया दुकानों को बंद रखने का फरमान :

लालचौक में कश्मीरी दस्तकारी की दुकान चलाने वाले जावेद नक्शबंदी ने कहा कि पहली बार यहां राष्ट्रपति के आगमन पर कोई हड़ताल का एलान नहीं हुआ है। डाउन टाउन में कफ्र्यू नहीं लगाया गया है। यहां सभी कुछ सामान्य है। पहले तो प्रधानमंत्री हो या राष्ट्रपति, कश्मीर में कदम रखते बाद में थे, दुकानों को बंद रखने का फरमान आ जाता था। इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ।

पहली बार देखी ऐसी खामोशी :

कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ आसिफ कुरैशी ने कहा कि कश्मीर विश्वविद्यालय के किसी छात्र संगठन ने भी इस बार कोई बयान जारी नहीं किया। पहली बार अलगाववादी खेमा भी शांत बैठा हुआ है। 

Edited By: Rahul Sharma