श्रीनगर, नवीन नवाज। कश्मीर की आबोहवा में बदलाव को सीधा महसूस किया जा सकता है। पहले की तरह हड़ताल, आजादी और अलगाववाद से जुड़े मुद्दों पर अब कोई बात करता नजर नहीं आता। अगर कभी दो लोगों के बीच इन मुद्दों पर बहस शुरू भी होती है तो यह कहकर बात खत्म हो जाती है, बीते 70 वर्षो में क्या पाया, सिर्फ गंवाया है। अब पाने के वक्त है इसलिए अतीत को भुला अमन, ऐसे में अगर कुछ करना है तो यह करो कि जिहादियों के दुष्प्रचार से गुमराह हो तबाही के रास्ते पर निकले युवकों को वापस लाने में सहयोग करो।

बीते एक साल में कश्मीर में बहुत कुछ बदल गया है। पुलवामा हमले और अनुच्छेद-370 हटने के बाद लोगों की सोच बदली है। एक दुकानदार जावेद नक्शबंदी ने कहा कि कश्मीर में आज जो हो रहा है अच्छा हो रहा है। क्योंकि हमने सबकुछ खोया है। लाल दस्तकारी की दुकान चलाने वाले जावेद कहते हैं कि पुलवामा हमला जब हुआ तो हम बहुत डर गए थे। हमें लगता था कि कश्मीर कभी नहीं बदलेगा। फिर पिछले अगस्त आया और अनुच्छेद-370 को ले उड़ा और कश्मीर बदलने लगा। आज किसी को पूछोगे हड़ताल कब है, तो जवाब मिलेगा जाओ अपना काम करो। जबकि पहले हड़ताल की अफवाह पर ही कारोबार बंद हो जाते थे। वाकई यह बदलाव जमीनी हकीकत बयान करते हैं। यह हालात ही अब कश्मीर की नई पीढ़ी का भविष्य भी तय करेंगे।

केंद्र से वादे पूरे करने की दुहाई - पत्रकार रमीज ने कहा कि कश्मीर के आज स्वायत्तता, स्वशासन, आतंकवाद व पाकिस्तान जैसे मुद्दों पर नहीं रोजगार-विकास से जुड़े मुद्दों पर बातचीत होती है। हां, बहस में कई बार लोग पुनर्गठन अधिनियम के तहत जम्मू-कश्मीर के विभाजन पर जरूर रोष जताते हैं। इसके साथ वह केंद्र सरकार को अपने वादों को पूरा करने की दुहाई देते हुए कहते हैं कि चलो अब यहां रोज-रोज उठाने वाले जनाजे बंद होंगे। क्योंकि कोई पुलवामा जैसा हमला नहीं चाहता।

70 वर्षो में कश्मीरियों ने सिर्फ गंवाया है - सैफुल्लाह जो पहले आतंकवाद की राह पर चल पड़े थे, लेकिन जब हकीकत पता चली तो घर लौट आए। वह कहते हैं कि पुलवामा हमला और उसके बाद अनुच्छेद-370 की समाप्ति कश्मीर के लिए वरदान साबित हुई है। जिस समय पुलवामा हमला हुआ तो यहां कई लोग कहते थे कि कश्मीर अब अफगानिस्तान बन रहा है, इसे रोको। अब वही लोग कहते हैं कि 70 वर्षो में कश्मीरियों ने सिर्फ गंवाया है।

कश्मीरी हमेशा से ही राष्ट्रभक्त - डेमोक्रेटिक पार्टी नेशनलिस्ट के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री गुलाम हसन मीर ने कहा कि कश्मीरी हमेशा से ही राष्ट्रभक्त रहे हैं। लेकिन अलगाववाद की सियासत से ही कश्मीरी तंग थे। आपने देखा होगा कि अब कश्मीर के कई नए-पुराने सियासतदान पूर्ण राज्य व विकास की बात कर रहे हैं।

अब बच्चों के नंबरों पर होती है बात - समाजसेवी सलीम रेशी ने कहा कि पहले जब हम लोगों के बीच जाते थे तो पता चलता था कि लड़के जिहादी बन रहे हैं। जबकि अब कहा जाता है कि बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दो। नंबर अच्छे होने चाहिए। आतंक की राह पर भटके युवाओं को वापस लाने के लिए लोग खुद सेना से संपर्क करते हैं।

बहुत कुछ बदल गया : सेना - चिनार कोर के सैन्याधिकारी ने कहा कि पहले हम लोगों के पास जाकर कहते थे कि आतंकी बने अपने बच्चों को आत्मसमर्पण के लिए मनाओ। अब लोग आकर कहते हैं कि सरेंडर करना चाहता है। कुछ महीनों के दौरान 60 से ज्यादा लड़कों को आतंकी बनने से रोका गया है।

आइएएस बनने का जुनून - शिक्षाविद् मुहम्मद राही ने कहा कि आतंकवाद से सबसे अधिक ग्रस्त रहे दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले में इन दिनों युवाओं में भारतीय प्रशासनिक सेवा और कश्मीर प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बनने का जुनून है। जिला प्रशासन शोपियां ने युवाओं को अधिकारी बनाने के लिए पहल की है।

 

Posted By: Rahul Sharma

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