गजब... न ट्रेंकुलाइजर-ना बजट और न ही नसबंदी; क्या सिर्फ केले और चने के भरोसे थमेगा जम्मू में बंदरों का आतंक?
जम्मू शहर में बंदरों का आतंक बढ़ गया है, जिससे लोग भयभीत हैं और घरों से बाहर निकलने से डर ...और पढ़ें

मंदिरों के शहर जम्मू में बंदरों का आतंक। (फाइल फोटो)
HighLights
जम्मू में बंदरों का आतंक, लोग भयभीत, घरों में घुसकर तोड़फोड़।
नगर निगम और वन्य जीव विभाग जिम्मेदारी टाल रहे, कोई ठोस नीति नहीं।
अवैज्ञानिक तरीके से पकड़े बंदर वापस लौटते, नसबंदी का अभाव।
जागरण संवाददाता, जम्मू। मंदिरों के शहर जम्मू में इन दिनों आस्था से ज्यादा खौफ का पहरा है। यह खौफ किसी बाहरी तत्व का नहीं, बल्कि शहर की छतों, गलियों और बाजारों पर कब्जा जमाए बैठे बंदरों का है। पुराने शहर के कच्ची छावनी, पक्का डंगा, मुबारक मंडी, जैन बाजार, बाहू फोर्ट, राजीव नगर, न्यू प्लाट, रिहाड़ी, जानीपुर और रूपनगर तक, शायद ही कोई इलाका बचा हो जहां बंदरों के झुंड उत्पात न मचा रहे हों।
दिनदहाड़े राहगीरों पर झपटना, सामान छीनना और घरों में घुसकर तोड़फोड़ रोजमर्रा की बात हो चुकी है। बच्चे छतों पर जाने से डर रहे हैं और बुजुर्गों ने सुबह की सैर छोड़ दी है। लेकिन जनता की इस लाचारी के बीच जम्मू नगर निगम और वन्य जीव संरक्षण विभाग के बीच जिम्मेदारी टालने की रस्साकशी बदस्तूर जारी है।
हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा शहरी क्षेत्रों में बंदरों के आतंक पर नगर निकायों की प्राथमिक जवाबदेही तय करने और अंतर-विभागीय टालमटोल पर लगाई गई कड़ी फटकार ने जम्मू के तंत्र की अकर्मण्यता को भी पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।
न ठोस नीति, न संसाधन
स्मार्ट सिटी के दावों के बीच नगर निगम के पास बंदरों से निपटने के लिए न कोई ठोस नीति है और न संसाधन। निगम इसे वन्यजीव अधिनियम के तहत वन्य जीव विभाग का दायरा बताकर पल्ला झाड़ लेता है, तो वन्य जीव विभाग सीमित अमले का हवाला देकर शहर की तंग गलियों में आने से बचता है।
दोनों विभागों की इस खींचतान में शहरवासियों की सुरक्षा पूरी तरह लावारिस हो चुकी है। न तो निगम ने प्रशिक्षित कैचर्स का कोई दस्ता बनाया और न ही प्रशासन ने दोनों विभागों का कोई संयुक्त नोडल तंत्र खड़ा किया।
जंगलों से वापसी
शहर में बंदर पकड़ने की व्यवस्था आज भी पूरी तरह गैर-वैज्ञानिक और रस्म अदायगी भर है। भारी दबाव बनने पर वन्य जीव विभाग लोहे के चंद पारंपरिक पिंजरे रखवा देता है, जिनमें चने या केले रखकर बंदरों के फंसने का इंतजार किया जाता है। आंकड़े बताते हैं कि जम्मू संभाग के स्वास्थ्य केंद्रों और जीएमसी में सालाना औसतन 1500 से 2000 से अधिक मामले जानवरों के काटने के दर्ज होते हैं जिनमें बड़ी तादाद मंकी बाइट्स की है।
इसके उलट पूरे साल में पकड़े जाने वाले बंदर 50 से 100 भी नहीं होते। जो गिने-चुने बंदर पकड़े जाते हैं, उन्हें बिना टैगिंग या नसबंदी के बाहरी जंगलों में छोड़ दिया जाता है। शहरी कचरे और पकी खुराक के आदी ये बंदर चंद हफ्तों में और अधिक आक्रामक होकर बस्तियों में लौट आते हैं।
तकनीकी और वित्तीय खोखलापन
संकट के पीछे तकनीकी और वित्तीय खोखलापन मुख्य वजह है। ट्रेंकुलाइजर गन, आधुनिक वैन और ट्रेंड कैचर्स का भारी टोटा है। बाहरी राज्यों से पेशेवर कैचर्स बुलाने पर प्रति बंदर 800 से 2000 रुपये का खर्च आता है, जिसके लिए निगम के पास कोई मद ही नहीं है। पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश ने समय रहते मंकी स्टरलाइजेशन सेंटर्स बनाकर इनकी तादाद नियंत्रित करने का माडल तैयार किया लेकिन जम्मू-कश्मीर में ऐसी किसी योजना का नामोनिशान नहीं है।
क्या कहते हैं अधिकारी
जेएमसी ज्वाइंट कमिश्नर कुलभूषण खजूरिया ने बताया कि बंदरों को पकड़ने का काम वन्य जीव विभाग ही देखता है। फिलहाल निगम में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है और न ही कोई अलग से फंड निर्धारित है। कुत्तों को पकड़ने के लिए डॉग कैचर्स और एबीसी प्रोग्राम मौजूद है।
