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कम खर्च में बंपर कमाई, जम्मू-कश्मीर के किसान धान-गेहूं के अलावा इन फसलों पर भी दें ध्यान, बदल जाएगी किस्मत

Published: Tue, 20 Oct 2026 07:00 AM (IST)

मोटे अनाज की खेती किसानों के लिए कम लागत में बंपर पैदावार और अच्छी कमाई का जरिया बन सकती है, ...और पढ़ें

बाजरा-ज्वार समेत ये मोटे अनाज बन सकते हैं जम्मू के किसानों का सहारा।

बाजरा-ज्वार समेत ये मोटे अनाज बन सकते हैं जम्मू के किसानों का सहारा।

HighLights

  1. मोटे अनाज कम लागत, कम पानी में बंपर पैदावार देते हैं।

  2. ये फसलें सूखे और प्रतिकूल मौसम को सहन करने में सक्षम हैं।

  3. बाजरा, ज्वार, रागी जैसे अनाज पोषण से भरपूर होते हैं।

जागरण संवाददाता, जम्मू। आज के समय में जब मौसम का कोई भरोसा नहीं रहा, कभी सूखा पड़ जाता है तो कभी बेमौसम बारिश होती है और जमीन में पानी का स्तर लगातार गिर रहा है। ऐसे में मोटे अनाज किसानों के लिए बड़ा सहारा बन सकते हैं। अगर किसान मोटे अनाज की खेती करें तो कम लागत व कम सिंचाई में बंपर पैदावार और अच्छी कमाई हो सकती है।

एक समय था जब आम लोगों, विशेषकर ग्रामीण परिवारों के भोजन का अहम हिस्सा रहे ये अनाज बदलती खानपान की आदतों के कारण धीरे-धीरे हमारी थाली से दूर हो गए थे, लेकिन अब इनके पौष्टिक गुणों और खेती में उपयोगिता के कारण इनकी अहमियत दोबारा बढ़ रही है।

मोटे अनाज केवल भोजन का विकल्प नहीं हैं, बल्कि ये टिकाऊ खेती, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

क्या हैं मोटे अनाज?

मोटे अनाज घास परिवार से संबंधित फसली पौधों के छोटे दानों वाले अनाज हैं। इनकी खेती एशिया और अफ्रीका के शुष्क तथा अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में हजारों वर्षों से होती आ रही है। भारत में बाजरा, ज्वार, रागी, कंगनी, कुटकी, कोदो और सियूल प्रमुख मोटे अनाजों में शामिल हैं।

इन फसलों के महत्व पर शे-ए-कश्मीर कृषि विश्वविद्यालय के एग्रोनामी की प्रो. मीनाक्षी गुप्ता के अनुसार, इन फसलों की खासियत यह है कि इनमें से कई फसल कम पानी और सीमित कृषि संसाधनों में भी अच्छी तरह उग सकती हैं।

यही कारण है कि वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों के लिए ये फसलें उपयोगी विकल्प बन सकती हैं। खासकर जम्मू संभाग के कंडी क्षेत्र में इन फसलों की अच्छी पैदावार संभव है।

कम पानी में खेती, किसानों के लिए राहत

प्रो. मीनाक्षी गुप्ता के अनुसार, धान और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों की तुलना में कई मोटे अनाजों को कम पानी की आवश्यकता होती है। इनमें से अनेक फसलें सूखे की स्थिति को सहन करने और प्रतिकूल मौसम में भी उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं।

जम्मू-कश्मीर सहित देश के उन क्षेत्रों में, जहां खेती काफी हद तक बारिश पर निर्भर है, स्थानीय मिट्टी और जलवायु के अनुकूल मोटे अनाजों की खेती पर ध्यान देना लाभकारी हो सकता है। हालांकि, फसल का चुनाव करते समय क्षेत्र की ऊंचाई, तापमान, मिट्टी, बारिश और उपलब्ध सिंचाई सुविधाओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

इन फसलों की खेती में कई परिस्थितियों में कम कृषि निवेश की जरूरत पड़ सकती है। इससे छोटे और सीमांत किसानों को खेती की लागत नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

पोषण से भरपूर हैं मोटे अनाज

प्रो. मीनाक्षी ने बताया कि मोटे अनाजों की बढ़ती लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण इनका पोषण मूल्य है। इनमें प्रोटीन, आहार रेशा, खनिज और अन्य उपयोगी पोषक तत्व पाए जाते हैं। अलग-अलग- अलग अनाजों में पोषक तत्वों की मात्रा अलग होती है। बाजरा आयरन और आहार रेशे का उपयोगी स्रोत है।

ज्वार में प्रोटीन और रेशा पाया जाता है। रागी कैल्शियम के लिए विशेष रूप से जानी जाती है। वहीं, कंगनी, कोदरा, कुटकी और सियूल भी संतुलित आहार में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

इन अनाजों से रोटी, दलिया, खिचड़ी, उपमा और कई पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जा सकते हैं। इस प्रकार मोटे अनाज ग्रामीण खानपान की पुरानी परंपराओं को नया जीवन देने के साथ-साथ पौष्टिक भोजन के विकल्प भी उपलब्ध कराते हैं।

मोटे अनाज और उनकी विशेषताएं

बाजरा : कम बारिश वाले क्षेत्रों में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण फसल। इसके दानों में प्रोटीन, आयरन और रेशा पाया जाता है।

ज्वार : भोजन, पशु चारे और कुछ औद्योगिक उपयोगों के लिए महत्वपूर्ण।
रागी: कैल्शियम से भरपूर अनाज, जो बच्चों और वयस्कों के संतुलित आहार में उपयोगी है।
कंगनी: पारंपरिक रूप से उगाया जाने वाला अनाज, जिसमें रेशा और खनिज पाए जाते हैं।
कोदो : वर्षा आधारित खेती में उपयोगी विकल्प, जिसे विभिन्न पारंपरिक व्यंजनों में इस्तेमाल किया जाता है।
कुटकी: छोटे दाने वाला पौष्टिक अनाज, जो विविध खाद्य पदार्थों के निर्माण में उपयोगी है।
सियूल : आहार रेशे और खनिजों का स्रोत, जिसका उपयोग विशेष रूप से पारंपरिक व्यंजनों में होता है।

इन फसलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उन्नत किस्मों, उचित बुवाई समय और वैज्ञानिक कृषि प्रबंधन पर ध्यान देना आवश्यक है।

भविष्य की थाली में मोटे अनाजों की वापसी

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष घोषित किया था। इस पहल ने दुनिया भर में मोटे अनाजों के पोषण, खेती और खाद्य सुरक्षा में योगदान को चर्चा के केंद्र में लाने में मदद की।

अब जरूरत इस बात की है कि मोटे अनाजों को केवल पारंपरिक भोजन तक सीमित न रखा जाए, बल्कि आधुनिक कृषि, खाद्य प्रसंस्करण और बाजार व्यवस्था से भी जोड़ा जाए।

अगर किसानों को उचित जानकारी, गुणवत्तापूर्ण बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार तक पहुंच मिले, तो इन फसलों की उपयोगिता और बढ़ सकती है।