लद्दाख में संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं पर बड़ा फैसला, LG ने रद की सीमा निर्धारण रिपोर्ट; 23 परियोजनाओं को मिली मंजूरी
लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने हेमिस, चांगथांग और काराकोरम वन्यजीव अभयारण्यों में स्थानीय समुदायों के अधिकारों के निपटारे को दो महीने में पूरा करने का निर्देश दिया है।
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राज्य वन्यजीव बोर्ड की 16वीं बैठक की अध्यक्षता करते एलजी विनय सक्सेना। फोटो सोशल मीडिया
HighLights
उपराज्यपाल ने दो माह में अधिकारों के निपटारे का निर्देश दिया।
सीमा निर्धारण उप-समिति की रिपोर्ट को रद्द किया गया।
स्थानीय लोगों से भूमि संबंधी दावे प्रस्तुत करने की अपील।
राज्य ब्यूरो, जम्मू। केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने हेमिस नेशनल पार्क, हाई एल्टीट्यूड कोल्ड डेजर्ट (चांगथांग) वाइल्डलाइफ सेंंचुरी और काराकोरम (नुब्रा-श्योक) वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी में स्थानीय समुदायों के अधिकारों और दावों के निपटारे की प्रक्रिया को दो महीने के भीतर पूरा करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही इन संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं के निर्धारण को लेकर गठित उप-समिति की रिपोर्ट को रद कर दिया गया है।
यह फैसला शुक्रवार को लद्दाख के राज्य वन्यजीव बोर्ड की 16वीं बैठक में लिया गया। बैठक की अध्यक्षता उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने की। बैठक में तीनों संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं के अंतिम निर्धारण को लेकर उप-समिति की रिपोर्ट पर विस्तार से चर्चा हुई।
बोर्ड ने पाया कि पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से 1987 में जारी प्रारंभिक अधिसूचना में इन वन्यजीव क्षेत्रों की सीमाओं का जमीनी स्तर पर सही तरीके से मानचित्रण नहीं किया गया। स्थानीय लोगों की ओर से लंबे समय से यह मांग उठाई जाती रही है कि इन क्षेत्रों में कई पुरानी बस्तियां मौजूद हैं, जिन्हें संरक्षित क्षेत्र की सीमा में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
टेबल पर ही सीमाओं का निर्धारण
उपराज्यपाल ने कहा कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत प्रस्तावित संरक्षित क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्तियों और समुदायों के अधिकारों के निपटारे की वैधानिक प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। उन्होंने कहा कि उप-समिति ने जमीनी सत्यापन और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बजाय टेबल पर ही सीमाओं का निर्धारण किया, जिससे यह प्रक्रिया प्रभावित समुदायों के लिए असमान और कानूनी चुनौती के प्रति संवेदनशील हो गई।
बोर्ड ने यह भी माना कि उप-समिति की रिपोर्ट में रणनीतिक महत्व वाले कई क्षेत्रों को शामिल किया गया है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आवश्यक रक्षा पहलुओं को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा गया। इसके अलावा संरक्षित क्षेत्रों की सीमाएं निर्धारित करते समय सर्वे आफ इंडिया के मानचित्रों में दर्शाई गई
अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को भी उचित संदर्भ नहीं बनाया गया।
इन खामियों को गंभीरता से लेते हुए बोर्ड ने उप-समिति की रिपोर्ट को अलग रखने का निर्णय लिया। साथ ही संबंधित उपायुक्तों और सेटलमेंट अधिकारियों को सार्वजनिक सुनवाई की प्रक्रिया फिर से शुरू करने तथा दो महीने के भीतर अधिकारों और दावों के निपटारे की कार्यवाही पूरी करने के निर्देश दिए गए।
उपराज्यपाल सक्सेना ने स्थानीय लोगों से अपने भूमि संबंधी दावों, दस्तावेजों और पारंपरिक अधिकारों को प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत करने की अपील की।
इसमें चरागाह भूमि से जुड़े पारंपरिक अधिकार भी शामिल हैं। प्रशासन का मानना है कि दावों के निपटारे से संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं को लेकर स्थानीय समुदायों को स्पष्टता और उनके वैध अधिकारों की पहचान मिल सकेगी। साथ ही इससे वन्यजीव संरक्षण और विकास कार्यों के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था तैयार होगी।
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23 महत्वपूर्ण परियोजनाओं की मंजूरी
बैठक में राज्य वन्यजीव बोर्ड ने 23 महत्वपूर्ण परियोजनाओं को भी मंजूरी देकर राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति के पास भेजा। इनमें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीमावर्ती क्षेत्रों में बिजली पारेषण ढांचे, रक्षा अवसंरचना और कराकोरम तथा चांगथांग क्षेत्रों से संबंधित अन्य आवश्यक परियोजनाएं शामिल हैं।
बैठक में लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा, अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव वार्डन एस. राजेश, आईएफएस, राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य तथा यूटी प्रशासन और वन, वन्यजीव, पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
