सुमित शर्मा, जम्मू। दशकों बाद जम्मू ने अंगड़ाई ली। हाथों में केसरिया। शान से लहराता राष्ट्रध्वज। ढोल-नगाड़ों की थाप। चौक-चौराहों पर बंटती मिठाई और युवाओं के सिर पर डोगरा पगड़ी.. यह बताने के लिए काफी थी कि आज का दिन कुछ खास है। खास हो भी क्यों न। यह जश्न था-देश के साथ विलय का एतिहासिक फैसला करने वाले जम्मू कश्मीर के अंतिम डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह की जन्मतिथि पर लंबे संघर्ष के बाद मिले पहले अवकाश का। यह उल्लास था-जम्मू की सुनी गई आवाज का। यह जोश था-70 साल से भेदभाव के दंश से बाहर आए जम्मू और डोगरा सम्मान की जीत का।

मुख्य कार्यक्रम तवी नदी के पुल पर महाराजा हरि सिंह की प्रतिमा के पास हुआ। जहां सुबह से ही जम्मू के विभिन्न हिस्सों से नागती-गाती युवाओं की टोलियां प्रतिमा के पास एक-एक कर पहुंचती गई। यह जश्‍न अवकाश का नहीं डोगरा स्‍वाभिमान के उदय दिवस के तौर पर अधिक मनाया जाएगा। जम्‍मू को अपनी खोई पहचान दिलाने का यह अवसर बन रहा है। यही वजह है कि महाराजा की जन्‍मतिथि पर अवकाश की मांग पर पूरा जम्‍मू एकसाथ उठ खड़ा हुआ। इसी बीच, अवकाश को लेकर किए गए आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले युवा राजपूत संगठन के सदस्य अपने अध्यक्ष राजन सिंह हैप्पी के साथ एक रथ पर महाराजा की प्रतिमा के साथ तवी पुल पर पहुंचे।

सबसे पहले क्रेन की मदद से महाराजा की प्रतिमा को फूलों से लादा गया। इसके बाद शुरू हुआ जश्न। इसमें कार, मोटरसाइकिल व घोड़ों पर सवार होकर आए हजारों युवकों के साथ भाजपा के वरिष्ठ नेता और समाज का हर वर्ग शामिल हुआ। डोगरा पगड़ी पहने महिलाओं की संख्या भी काफी रही। इस मौके पर भाजपा नेताओं ने महाराजा की 127वीं जयंती पर 127 किलो का लड्डू काटा और सभी को बधाई दी।

Edited By: Lokesh Chandra Mishra