जम्मू, जागरण संवाददाता : मचैल माता की छड़ी यात्रा वीरवार को जम्मू से ढोल नगाड़ों के बीच पूरी धार्मिक आस्था एवं श्रद्धा के साथ जम्मू से रवाना हुई। छड़ी को मंडलायुक्त जम्मू रमेश कुमार ने वीरवार सुबह रेडियो स्टेशन चौक पंजतीर्थी से झंडी दिखाकर रवाना किया। छड़ी जैन बाजार से ढोल नगाडों के बीच रेडियो स्टेशन चौक पहुंची। इस मौके पर विभिन्न बाजार एसोसिएशनों के पदाधिकारियों एवं यात्रा के लिए सहयोग करने वाले नेताओं को माता की चुनरी एवं तस्वीर देकर सम्मानित किया गया।

करीब घंटे भर के इस कार्यक्रम के दौरान माता के जयकारे गूंजते रहे। बाद में छड़ी के साथ जाने वाले श्रद्धालु पूरे उत्साह के साथ भजन कीर्तन एवं जयघोष करते मचैल माता के दरबार के लिए रवाना हुए।छड़ी जिस रास्ते से भी निकली श्रद्धालुओं को भव्य स्वागत किया गया। सर्वशक्ति सेवक संस्था के बैनर तले निकली इस छड़ी यात्रा को रवाना करते हुए मंडलायुक्त जम्मू ने सभी को शुभकामना देते हुए और माता का जयकारा लगाते हुए रवाना किया। उन्होंने कहा कि ऐसी यात्राएं श्रद्धा और आस्था का केंद्र होती हैं। एक दूसरे से जोड़ती हैं।एक दूसरे की कला संस्कृति को समझने का मौका मिलता है।उन्होंने कहा कि मचैल माता के साथ लोगों की आस्था जुड़ी हुई है और हर वर्ष माता के दर्शनों के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

यात्रा वीरवार रात किश्तवाड़ रुकेगी। छड़ी 22 अगस्त को माता के दरबार पहुंचेगी। मचैल यात्रा 25 जुलाई से शुरू हो गई थी। मचैल गांव किश्तवाड़ से 95 किलोमीटर और गुलाबगढ से तीस किलोमीटर दूर भूर्ज और भोट नाले के बीच स्थित अत्यंत खूबसूरत गांव है। दुर्गम पहाड़ियों के बीच प्रकृति की गोद में बसे इस गांव के मध्य भाग में प्रसिद्ध मचैल माता का मंदिर काष्ठ का बना हुआ है। इस मंदिर के मुख्य भाग में समुद्र मंथन का आकर्षक और कलात्मक दृश्य अंकित है। मंदिर के बाहरी भाग में पौराणिक देवी-देवताओं की मूर्तियां लकड़ी की पट्टिकाओं पर बनी हुई हैैं। मंदिर के भीतर मां चंडी एक पिंडी के रूप में विराजमान हैं। इस पिंडी के साथ दो मूर्तियां स्थापित हैं। जिनमें एक चांदी की मूर्ति है। इसके बारे में कहा जाता है कि बहुत पहले जंस्कार, लद्दाख के बौद्ध मतावलंबी भोटों ने इसे मंदिर में चढ़ाया था। इसलिए इस मूर्ति को भोट मूर्ति भी कहते हैं। मूर्तियों पर कई प्रकार के आभूषण सजे हैं। मंदिर के सामने खुला मैदान है। जहां यात्री खड़े हो सकते हैं।यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ती ही जा रही है। जिसके चलते यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी हर वर्ष बढ़ती ही जा रही है।

यात्रा में धीरे-धीरे जम्मू से ही नहीं बाहरी राज्य पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश से भी श्रद्धालु आने लगे हैं।मचैल यात्रा भाद्रपद संक्रांति से दो दिन बाद भद्रवाह के चिनौत गांव से प्रांरभ होती है। जिसकी विधिवत पूजा की जाती है। छड़ी में हजारों लोग ढोल, नगाड़े जैसे वाद्य यंत्रों के सुरीले और दिव्य रागों से मां के जयकारे लगाते हुए चलते हैं। इस यात्रा का महत्वपूर्ण व पहला पड़ाव किश्तवाड़ होता है। इस यात्रा की एक कड़ी के रूप में महालक्ष्मी मंदिर पक्का डंगा जम्मू से भी एक छड़ी निकाली जाती है, जो किश्तवाड़ पहुंच कर यात्रियों के साथ मिल जाती है। इस तरह से यह यात्रा पूरे जम्मू संभाग की यात्रा बन जाती है।

किश्तवाड़ में यात्रा का भव्य स्वागत होता है। यहां रात्रि विश्राम व खाने-पीने की व्यवस्था की जाती है। अगले दिन हजारों की संख्या में स्त्री, पुरुष, बच्चे व बूढ़े यात्रा की विदाई करते हैैं। किश्तवाड़ से गुलाबगढ़ की यात्रा वाहनों से तय की जाती है लेकिन इसके आगे पैदल सफर तय करना पड़ता है। वीरवार को रवाना हुई छड़ी यात्रा में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था। अधिकतर श्रद्धालु ऐसे थे जो पहले भी कई बार माता के दर्शन कर चुके हैं। उनका कहना था कि एक बार जो माता के दर्शन कर आता है। वह बार-बार मचैल माता के दर्शनों के लिए आता है।

Edited By: Vikas Abrol