रोहित जंडियाल, जम्मू : मात्र 17 साल उम्र और जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करने का हौसला। इसका खामियाजा भी भुगता। जेल हुई और पुलिस ने प्रताड़ित भी किया, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं टूटी। जेल से बाहर आने के बाद फिर पहले की तरह ही जुल्म और प्रताड़ना के खिलाफ घर-घर जाकर आवाज उठाई। नतीजा फिर जेल की काली कोठरी में उन्हें डाल दिया गया। सुबह यातनाएं दी जाती थीं और रात को नींद नहीं आती थी। यह दास्तां है वर्तमान एमएलसी रमेश अरोड़ा की।

साल 1975 में जब देश में इमरजेंसी लगी तो उस समय वह बारहवीं कक्षा में पढ़ते थे। उस समय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ जुड़े हुए थे। जब उस दौर में सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों के खिलाफ जम्मू-कश्मीर सहित देशभर में यातनाएं दी जाने लगीं और लोगों को ठूंस-ठूंस कर जेल में डालना शुरू किया गया तो जम्मू में भी सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया। यहां पर भी जुलूस निकलने लगे। छात्र नेता के रूप में रमेश अरोड़ा भी जुलूस निकालने लगे। वह तत्कालीन केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते थे। जब पुलिस ने देखा कि अरोड़ा व उनके साथी एक जुलूस निकाल रहे हैं तो उन्हें अन्य साथियों के साथ पुलिस हिरासत में ले लिया गया। उन्हें सब जज ने जेल में भेज दिया। 16 दिन वह तब सेंट्रल जेल जम्मू में रहे और उन्हें छोड़ दिया गया। जेल से बाहर आने पर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। रमेश अरोड़ा को पर्चे प्रिट कर लोगों के घरों में बांटने की जिम्मेदारी सौंपी गई। उस समय प्रिटिग करना भी मुश्किल होता था। लकड़ी के एक फोल्डर में प्रिटिग होती थी। वह रात को प्रिटिग करते थे और सुबह जल्दी अंधेरे में ही लोगों के घर जाकर सरकार विरोधी पर्चे बांटते थे। इसमें इमरजेंसी के खिलाफ लोगों को लड़ने के लिए कहा जाता था। अरोड़ा को एक बार फिर से हिरासत में ले लिया गया। इस पर कोर्ट ने मेनटेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत साढ़े तीन महीने की सजा सुनाई गई। उन्हें विशेष रूप से बनाई गई जेल में भेज दिया गया। उस जेल में जम्मू के कई नेताओं को रखा गया था। रमेश अरोड़ा ने बताया कि आज भी वे दिन याद करके रूह कांप उठती है। कुछ साथियों के नाखून निकाल लिए गए थे। जेल में बहुत प्रताड़ित किया जाता था। पुलिस पीटती थी और उनसे कहा जाता था कि माफी मांग लो तथा यह लिखकर दे दो कि आगे से सरकार के खिलाफ नहीं बोलेंगे तो रिहा कर दिया जाएगा। लेकिन कोई भी पुलिस की यातनाओं के आगे झुकता नहीं था। उनका एक साथी था ओंकार। उसके नाखून निकाल लिए गए थे। दो और साथी थे अशोक और विजय। एक तो अब इस दुनिया में नहीं है। उस समय हम सभी छोटे थे, मगर सभी के हौसले बुलंद थे। आज भी उस समय के 50 से 60 लोग अभी लोकतंत्र की मजबूती के लिए काम कर रहे हैं। अरोड़ा इस समय राज्य विधानपरिषद के सदस्य हैं।

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Posted By: Jagran