जम्मू, नवीन नवाज। कश्मीर में सुरक्षाबलों के बढ़ते दबाव से हताश आतंकी अब जम्मू संभाग के उन इलाकों को अपना गढ़ बना रहे हैं, जहां कभी उनकी तूती बोला करती थी। ये इलाके कश्मीर से सटे हैं और वे यहां अपने लिए नया ठिकाना बना चुके हैं। यह सुरक्षाबलों की विफलता को भी इंगित करता है। किश्तवाड़ में पिछले कुछ महीनों में बढ़ते आतंकवादी हमले यह स्पष्ट कर देते हैं कि कश्मीर से सटा किश्तवाड़ अब वादी की राह पर चल पड़ा है।

दक्षिण कश्मीर में शुक्रवार को पांच आतंकियों की मौत के साथ ही इस साल मारे गए आतंकियों की तादाद 101 हो गई। दूसरी तरफ, शुक्रवार को ही किश्तवाड़ में आतंकियों के हमले में दो एसपीओ गंभीर रूप से घायल हो गए। हमले के बाद आतंकी भाग निकले। किश्तवाड़ के ऊपरी क्षेत्र अप्पन में जो कि माडवा घाटी का हिस्सा है और कश्मीर से सटा है, में शुक्रवार दोपहर को हुई यह घटना बेशक किसी को हैरान न करे, लेकिन जिस तरह से बीते एक डेढ़ माह के दौरान सुरक्षाबल इस इलाके में या फिर किश्तवाड़ के अन्य हिस्सों में आतंकियों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, उसे देखते हुए यह हैरान करने वाली है।

आतंकियों ने जिस तरीके से सुबह सात बजे के करीब यह हमला किया, उससे साफ है कि न सिर्फ उनके पास सुरक्षाबलों की मूवमेंट की पूरी खबर थी बल्कि वह पूरी तरह प्रशिक्षित भी थे। हमलावरों की तादाद भी दो नहीं हो सकती, उनकी तादाद कम से कम पांच होनी चाहिए या उससे ज्यादा। अगर यह बात सही है तो संकट को समझा जा सकता है।

किश्तवाड़ में शांति का मतलब यह नहीं कि आतंकवाद समाप्त हो गया है

वर्ष 2005 तक कितश्वाड़ आतंकी हिंसा के लिए अक्सर सुर्खियां बटोरता रहा है। उसके बाद करीब आठ साल तक यह लगभग शांत ही रहा। इसका यह मतलब कतई नहीं था कि यहां आतंकी खत्म हो चुके थे। आतंकी थे, लेकिन उनकी तादाद दहाई की संख्या से नीचे चली गई थी और वह कभी कभार ही नीचे आते थे। वह किसी वारदात को अंजाम देने से बचते थे। लेकिन शांत हो चुके किश्तवाड़ की आबोहवा में बीते पांच साल से बदलाव आने लगा। राज्य पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक ही बीते पांच साल में एक दर्जन से ज्यादा लोग किश्तवाड़ में जिहादी गतिविधियों के सिलसिले में पकड़े गए हैं। इसी साल पांच से ज्यादा आतंकी और उनके ओवरग्राउंड वर्कर पकड़े गए हैं। इनमें मोहम्मद अब्दुल्ला गुज्जर, तौसीफ अहमद, निसार गनई के नाम उल्लेखनीय हैं, जो जम्मू संभाग में मोस्ट वांटेड आतंकियों में सबसे ऊपर मोहम्मद अमीन जहांगीर के साथ जुड़े हुए थे। जहांगीर इस क्षेत्र का सबसे पुराना सक्रिय आतंकी है। असम के कमरुदीन के आतंकी बनने की कहानी भी किश्तवाड़ में ही शुरू हुई थी।

परिहार बंधुओं की हत्या के साथ आतंकियों ने अपनी मौजूदगी का एहसास कराया

गत नवंबर माह के दौरान आतंकियों ने किश्तवाड़ में अपनी उपस्थिति का एहसास दिलाते हुए भाजपा नेता अनिल परिहार व उनके भाई की हत्या कर दी। इससे पूरा सुरक्षा तंत्र हिल गया। परिहार बंधुओं की हत्या की गुत्थी सुलझी भी नहीं थी कि कुछ दिनों बाद जिला उपायुक्त किश्तवाड़ के अंगरक्षक से आतंकियों ने एके-47 राइफल व अन्य सामान छीन लिया। बीते माह की शुरुआत में आतंकियों ने आरएसएस नेता चंद्रकांत शर्मा व उनके अंगरक्षक की दिन दहाड़े हत्या कर दी। पुलिस और प्रशासन ने इन हत्याओं में लिप्त आतंकियों की निशानदेही करने का दावा किया। आतंकियों की तस्वीरों वाले पोस्टर भी जारी किए, इनाम भी घोषित किया गया, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। अलबत्ता, यह जरूर कहा जाता रहा कि आतंकी माडवा दच्छन में छिपे है या फिर कश्मीर भाग गए हैं। शुक्रवार को आतंकियों ने सुरक्षाबलों के काफिले पर पर हमला कर अपने दुस्साहस का परिचय दिया है।

वारदात के बाद ही क्यों खुलती है नींद

जिला किश्तवाड़ में आतंकी हमले की तीसरी बड़ी वारदात है। इससे पहले आतंकवादियों एक नवंबर को भाजपा के प्रदेश सचिव अनिल परिहार और बड़े भाई अजीत की हत्या कर दी। 9 अप्रैल को किश्तवाड़ अस्पताल में आरएसएस नेता चंद्रकांत को निशाना बनाया था। उससे पहले डीसी किश्तवाड़ के अंगरक्षक से एके-47 और 90 गोलियां छीनकर आतंकी फरार हो गए थे। ऐसा लग रहा है कि किश्तवाड़ में सक्रिय आंतकवादियों ने स्थिति मजबूत कर ली है। कई दिनों से यह खबर आ रही थी माडवा के इलाके में कुछ आंतकवादी सक्रिय हैं, क्योंकि दक्षिण कश्मीर में सुरक्षाबलों के दबाव के बाद कुछ आंतकवादी किश्तवाड़ के वाड़वन और माडवा के इलाके में आ गए हैं।

 

आइएसआइ ने जम्मू को दहलाने की बिछाई बिसात

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ जम्मू संभाग के शांत जिलों में आतंकवाद की फिर से बिसात बिछाने में लगी हुई है। इसकी मिसाल बुधवार को जम्मू के रतनूचक इलाके में स्थित सैन्य शिविर की वीडियोग्राफी करते पकड़े गए दो ओजीडब्ल्यू ने सनसनीखेज खुलासे किए। पकड़े गए तीन ओवरग्राउंड वर्करों ने बताया कि है कि आइएसआई डोडा, किश्तवाड़, कठुआ, राजौरी और पुंछ जिलों में फिर से आतंकवादी गतिविधियां बढ़ाने के लिए स्थानीय बेरोजगार युवाओं को फंडिग कर रही है। इसमें कई युवाओं को ओजीडब्ल्यू के तौर पर पाक सेना अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रही है। ओजीडब्ल्यू को सैन्य शिविरों की फोटोग्राफी करने का लक्ष्य दिया है।

मजदूरों के वेश में कुछ युवा सैन्य शिविरों की वीडियोग्राफी पाक बैठै सैन्य कमांडर शेर खान को भेजा करते थे। इन वीडियोग्राफी को पाक के गुलाम कश्मीर के बहावलपुर और मुरीदके में चल रहे लश्कर-ए-तैयबा के प्रशिक्षण शिविर में आतंकवादियों को दिखाई जाती थी जिससे लश्कर के आत्मघाती आतंकवादी भारतीय सैन्य शिविरों की वास्तविक स्थिति से परचित हो जाएं। फिदायीन हमले के दौरान उन्हें सैन्य शिविरों में उन्हें मोर्चा संभालने में आसानी हो सके। आइएसआइ की कोशिश है कि आने वाले दिनों में भारतीय क्षेत्रों में अधिक से अधिक घुसपैठ करवाई जाए।

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Posted By: Rahul Sharma

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