जम्मू, सुरेंद्र सिंह। बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर सभ्य नागरिक बनाने की चाहत ने शिक्षक बनने के लिए प्रेरित किया। शिक्षक बनकर जब पहली बार स्कूल गए तो सुभाष चंद्र बाली का पूरा जीवन ही बदल गया।

उन्होंने बच्चों को शिक्षित करने के लिए खुद को समर्पित कर दिया। 147 वर्ष पहले सुभाष चंद्र ने जम्मू शहर के प्रतिष्ठित जागृति निकेतन हायर सेकेंडरी स्कूल में बतौर शिक्षक अपना करियर शुरू किया था। उन्हें स्कूल के बच्चों से ऐसा लगाव हुआ कि कभी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन नहीं किया।

सुभाष बताते हैं कि जिस समय वह जागृति निकेतन में बतौर शिक्षक लगे थे, उस समय सरकारी नौकरी हासिल करना बहुत आसान था। आराम से कहीं भी नौकरी मिल जाती थी, लेकिन उन्होंने उस स्कूल को आज तक नहीं छोड़ा। वर्ष 1971 में वह इस स्कूल में आए थे। इसी स्कूल में बच्चों को पढ़ाते हुए उन्हें वर्ष 1974 में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद और वर्ष 1984 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से सम्मान हासिल हुआ।

सुभाष चंद्र को एनसीईआरटी से भी पुणो में बेस्ट टीचर अवार्ड मिल चुका है। वर्ष 2014 में राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री एवं इंडियन रेडक्रॉस सोसायटी के चेयरमैन जेपी नड्डा से भी सम्मान प्राप्त हो चुका है।

सुभाष कहते हैं कि शिक्षा के इस पेशे से उन्हें जो सम्मान और संतोष मिला है, वह शायद उन्हें कहीं और से नहीं मिल सकता था। बच्चों में शिक्षा का ज्ञान बांटते हुए भूखे और गरीब बच्चों की ओर ध्यान गया तो उनके मन में उन बच्चों के पुनर्वास का ख्याल आया। उन्होंने अपने स्तर पर जितना हो सका, उतना करने का प्रयास किया लेकिन जब प्रयास कम लगे तो इंडियन रेडक्रॉस सोसायटी से जुड़ गए और ऐसे बच्चों की मदद करने लगे। भूले-भटके बच्चों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए सुभाष चंद्र चाइल्ड लाइन संस्था से जुड़ गए।

जम्मू में चाइल्ड लाइन संस्था के वह संस्थापक सदस्य हैं और अब तक सैकड़ों भूले-भटके बच्चों को उनके घरों तक पहुंचा चुके हैं। सुभाष चंद्र जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क शिक्षा भी दे रहे हैं। इसके लिए वह घर में ही बच्चों के पठन पाठन में लगे हुए हैं। अपने इस सफर का श्रेय वह अपनी धर्मपत्नी उषा बाली को देते हैं।

उनका कहना है कि वे सुबह तड़के घर से निकलें या रात को देर से घर आएं, उनकी धर्मपत्नी ने हमेशा उनका साथ दिया। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए संस्कार भारती, युवा, सेवा एवं खेल विभाग, शिक्षा विभाग व अन्य संस्थाओं ने भी सम्मानित किया है। सुभाष का कहना है कि उन्होंने कभी सम्मान हासिल करने के लिए शिक्षा का ज्ञान बांटने के बारे में नहीं सोचा था। वह तो उनका कर्म था जो आज भी वह कर रहे हैं।

Posted By: Preeti jha