जम्मू, अशोक शर्मा। समाज को आईना दिखाने वाले एवं अपने साहित्य से मार्गदर्शन करने वाले विभिन्न भाषाओं के लेखक पिछले तीन वर्ष से अपनी पुस्तक के प्रकाशन के लिए जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी की सब्सिडी मिलने का इंतजार कर रहे हैं। करीब 26 लाख रुपये अटके हैं। इससे साहित्यकार निराश हैं। अकादमी की विभिन्न भाषाओं की साहित्यिक पत्रिका शीराजा के लिए लिखने वाले लेखकों की भी अकादमी लाखों की देनदार है। अनुवाद और दूसरे जरूरी कार्यो में योगदान देने वाले साहित्यकार भी बेसब्री से भुगतान का इंतजार कर रहे हैं लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।

जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बन जाने के बाद साहित्यकारों को कई बदलावों और समय पर भुगतान की उम्मीदें तो बढ़ी हैं लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा कि अकादमी का आने वाले दिनों में भविष्य क्या होगा। अकादमी पिछले पांच दशक से डोगरी, हिंदूी, पंजाबी, उर्दू, गोजरी, पहाड़ी आदि भाषाओं की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए सब्सिडी देती रही है। इससे ऐसे साहित्यकार भी अपनी पुस्तक प्रकाशित करवा सकते हैं, जिनके पास पर्याप्त पैसा नहीं होता। पिछले तीन वर्ष से सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों की सब्सिडी अटकी है।

साहित्यकारों में निराशा: अकादमी के समय पर भुगतान न करने से निराश साहित्यकारों प्रो. अशोक कुमार, चंदू भाऊ, मंगल दास डोगरा, डॉ. ज्ञान सिंह, डॉ. सुनीता भडवाल ने बताया कि समय पर सब्सिडी रिलीज न होने के कारण लेखक निराश होता है। जब दुनिया भर के कामों के लिए पैसा खर्च हो रहा है तो लेखकों के मामूली भुगतान में क्या अड़चन है। प्रो. राज कुमार ने कहा कि अधिकतर समय तो ऐसा होता है कि जब अकादमी की सब्सिडी रिलीज होती है, उस समय तक पुस्तक की प्रासंगिकता ही बदल चुकी होती है। इस समय अकादमी के पास सौ से ज्यादा पुस्तकों की स्क्रिप्ट हैं। अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बन जाने से कई चीजें बदल चुकी हैं। ऐसे कई घटनाक्रम समय के साथ होते रहते हैं, जो साहित्यकार की सोच को भी प्रभावित करते हैं। हो सकता है हमने तीन वर्ष पहले जिस सोच के साथ लिखा था, आज उसका कोई महत्व ही न रहा हो। सरकार को तो चाहिए कि जब भी कोई लेखक सब्सिडी के लिए आवेदन दे, उसे स्क्रीनिंग कर तुंरत जारी कर दे।

कई साहित्यकार काम करने से कर रहे इन्कार: आज के युग में अनुवाद का विशेष महत्व है। मात्र डोगरी इकाई ने ही करीब दो लाख का कार्य करवाया है लेकिन समय पर भुगतान न होने के कारण कई साहित्यकार काम करने से इन्कार कर रहे हैं। कोई दिन ऐसा नहीं होता जिस दिन कोई न कोई साहित्यकार पिछले भुगतान को लेकर अकादमी में न आता हो। साहित्यकारों ने कहा कि जिस तरह साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, रेडियो कश्मीर जम्मू में काम के साथ ही भुगतान हो जाता है, उसी तरह जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी को भी काम के साथ ही भुगतान करना चाहिए। इससे साहित्य का उत्थान होगा। नए लिखने वाले युवा भी प्रोत्साहित होंगे।

  • जम्मू डिवीजनल ऑफिस से सभी औपचारिकताएं पूरी कर फाइलें उपाध्यक्ष के माध्यम से पहले ही राज्यपाल को भेज दी गई थी लेकिन उसके बाद भुगतान क्यों नहीं हो पा रहा, इसकी कोई जानकारी नहीं है। - डॉ. अरविंद्र सिंह अमन, अतिरिक्त सचिव, अकादमी

Posted By: Rahul Sharma

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