जम्मू, जेएनएन। केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में लगता है कि कांग्रेस अपनी गलतियों से कुछ भी नहीं सीखना चाहती है। नए प्रदेश प्रधान की नियुक्ति के बाद जिस तरह से वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद सहित कईं अन्य नेताओं ने अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया और नए संगठन पर नाखुशी जताई, इससे साफ प्रतीत होता है कि आने वाले समय में कांग्रेस की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रही हैं।

कांग्रेस गत कईं वर्षों से से जम्मू-कश्मीर में अंतर्कलह से जूझ रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के अपने-अपने गुट होने के कारण जमीनी स्तर पर भी इसका असर देखने को मिल रहा है। कई वरिष्ठ नेता पहले ही पार्टी को छोड़कर अन्य राजनीतिक दलों में चले गए हैं। वहीं अन्य कईं अन्य नेताओं की भी पार्टी छोड़ने की चर्चा आए दिन होती रहती है।

राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस एक ऐसा राजनीतिक दल था जो कि पूरे जम्मू-कश्मीर में अपना वर्चस्व रखता था। विडंबना यह रही कि नेताओं की आपसी खींचतान और हाईकमान के समय रहते सही कदम न उठाने के कारण अब देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। पूर्व प्रधान जीए मीर के त्यागपत्र के बाद यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि नया प्रधान बनने के बाद पार्टी फिर से लोगों के बीच जाकर अपनी जड़ों को मजबूत करेगी लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत।

पार्टी की नई प्रदेश इकाई बनते ही कई नेताओं ने अपनी नाराजगी व्यक्त कर दी। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने भले ही सभी धड़ों को नई इकाई में साधने का दावा किया हो, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर देखने को नहीं मिल रहा है। वर्ष 2014 में हुए अंतिम विधानसभा चुनावों में जम्मू संभाग के कई जिलों और अंतिम दो संसदीय चुनावों में अपना खाता खोलने में भी नाकाम रही कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेश प्रधान के लिए आगे की राह बहुत कठिन है।

सभी वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर काम करना उनके लिए आसान नहीं है। यह सही है कि उन्हें कुछ वरिष्ठ नेताओं को आशीर्वाद प्राप्त है लेकिन उन्होंने भी अपनी नाराजगी जता दी। अगर कांग्रेस को विधानसभा चुनावों और संसदीय चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करना है तो उसे लोगों को एकजुटता का संदेश देना होगा, जो अभी आसान नहीं लग रहा। 

Edited By: Vikas Abrol