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बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह रखें दूर, वरना बोलने में देरी और भाषा विकास में होगी दिक्कत; बाल रोग विशेषज्ञ की सलाह

By Lalit KumarEdited By: Rahul Sharma
Published: Sat, 06 Jun 2026 07:00 AM (IST)Updated: Sat, 06 Jun 2026 11:17 AM (IST)

बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम अभिभावकों के लिए चिंता का विषय है, जिससे अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और बोलने में देरी जैसी ...और पढ़ें

मोबाइल दिखाकर खाना खिलाने की आदत पड़ रही है भारी, बच्चों में बढ़ रहे हैं खाने के नखरे और घट रही है सचेत भोजन की क्षमता।

मोबाइल दिखाकर खाना खिलाने की आदत पड़ रही है भारी, बच्चों में बढ़ रहे हैं खाने के नखरे और घट रही है सचेत भोजन की क्षमता

HighLights

  1. स्क्रीन टाइम से अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, बोलने में देरी।

  2. दो साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखें।

  3. अभिभावक खुद भी स्क्रीन अनुशासन का पालन करें।

जागरण संवाददाता, जम्मू। बच्चों में लगातार बढ़ता स्क्रीन टाइम आज लगभग हर दूसरे अभिभावक की चिंता का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है। मोबाइल फोन से बच्चों का लगाव और दिनभर इसके संपर्क में रहने से बच्चे न केवल अपने आसपास के वातावरण से कट रहे हैं, बल्कि कई जटिल बीमारियों से भी ग्रस्त हो रहे हैं जिनका शुरूआत में तो शायद कोई प्रभाव नजर नहीं आता लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव अब अध्ययन में सामने आने लगे हैं।

बच्चों की एकाग्रता में कमी, अनिंद्रा, चिड़चिड़ापन, मोटापा और बोलने में देरी जैसी समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही है और बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास अब ऐसे बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जून का महीना शुरू होते ही स्कूलों में छुट्टियों का दौर शुरू हो गया है और ऐसे में अभिभावकों को बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ने का चिंता सता रही है।

अभिभावकों की इस चिंता को समझते हुए और बच्चों में स्क्रीन टाइम के उचित मैनेजमेंट व स्क्रीन टाइम से पेश आ रही समस्याओं को जानने के लिए दैनिक जागरण ने बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर निरुपम गुप्ता से विशेष बातचीत की। पेश है इस बातचीत के कुछ मुख्य अंश :

Dr Nirupam Gupta

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. निरुपम गुप्ता

प्र. आज के समय में बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम कितनी बड़ी चिंता है?

ऊ. आज अत्याधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में अनिंद्रा, एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन, मोटापा, बोलने में दूरी व व्यवहारिक समस्याओं से जुड़ा पाया जा रहा है। इंडियन एकेडमी आफ पेडिआट्रिक्स(आइएपी) गाइडलाइंस भी संतुलित स्क्रीन टाइम की सलाह देती हैं।

प्र. किस उम्र तक बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना चाहिए?

ऊ. आइएपी के अनुसार दो साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन एक्सपोजर से बचाने को बेहतर माना जाता है।

प्र. क्या ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की बोलने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है?

ऊ. हां, छोटे बच्चों में अत्याधिक स्क्रीन टाइम बोलने के विकास में देरी और भाषा विकास पर असर डाल सकता है, खासकर जब सामाजिक कम हो जाए।

प्र. क्या मोबाइल देखकर खाना खिलाना सही है?

ऊ. बार-बार मोबाइल के कारण ध्यान भंग होने से सचेत भोजन करने की आदत कम होती है और खाने में नखरे करने की आदत बढ़ सकती है।

प्र. स्क्रीन की लत के शुरुआती लक्षण क्या हो सकते हैं?

ऊ. बार-बार मोबाइल मांगना, स्क्रीन हटाने पर चिड़चिड़ापन, आउटडोर गेम्स में रूझान कम होना, अनिंद्रा और एकाग्रता में कमी शुरुआती संकेत हो सकते हैं।

प्र. क्या एजुकेशनल वीडियो भी हानिकारक हो सकते हैं?

ऊ. उम्र के अनुसार उच्च गुणवत्ता वाली और सीमित समय तक देखी जाने वाली शैक्षणिक सामग्री बच्चों के सीखने में सहायक होती है लेकिन अत्याधिक और बिना निगरानी के स्क्रीन का उपयोग नुकसान कर सकता है। गुणवत्ता और समय अवधि, दोनों महत्वपूर्ण हैं।

प्र. अभिभावक एक हेल्दी स्क्रीन टाइम कैसे सेट करें?

ऊ. निश्चित स्क्रीम समय, बिना स्क्रीन के भोजन, उचित नींद की दिनचर्या और बाहरी गतिविधियां स्वस्थ आदतें बनाने में मदद करते हैं।

प्र. क्या अभिभावकों का खुद का मोबाइल इस्तेमाल भी बच्चों को प्रभावित करता है?

ऊ. हां, बच्चे अक्सर अभिभावकों को देखकर आदतें सीखते हैं। अगर अभिभावक अत्याधिक स्क्रीन टाइम की समस्या से पीड़ित है तो यह बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।

प्र. क्या सोते समय के आसपास स्क्रीन इस्तेमाल नुकसानदायक हो सकता है?

ऊ. हां, रात को सोते समय स्क्रीन संपर्क नींद को प्रभावित कर सकता है।

प्र. क्या हर बच्चा स्क्रीन टाइम से समान रूप से प्रभावित होता है?

ऊ. नहीं, असर बच्चे की उम्र, समय अवधि, कंटेंट और लाइफ स्टाइल पर भी निर्भर करता है।

प्र. अभिभावक किन व्यवहारिक कदमों से स्क्रीन टाइम कम कर सकते हैं?

ऊ. पारिवारिक स्क्रीन नियम, बिना गैजेट के भोजन, बाहरी गतिविधियां, पढ़ने की आदतें और माता-पिता का स्वयं का स्क्रीन अनुशासन मददगार हो सकता है।

प्र. कब एक बाल रोग विशेषज्ञ डाक्टर या काउंसलर की सलाह लेनी चाहिए?

ऊ. अगर बच्चे में अत्याधिक चिड़चिड़ापन, अनिंद्रा, सामाजिक कटाव, एकाग्रता में कमी, बोलने में समस्या या स्क्रीन निर्भरता बहुत ज्यादा हो, तो डाक्टर या काउंसलर की सलाह लेनी चाहिए।