श्रीनगर, राज्य ब्यूरो। 29 साल पहले धर्माध जेहादियों के हमले में जिंदा बचने के बाद अपना घाटी से कारोबार बंद कर दिल्ली जा बसे कश्मीर पंडित रोशन लाल जिंदगी के अंतिम पड़ाव में वापस वादी लौट आए हैं। अपने जन्मस्थान पर कदम रखते हुए उनके मुंह से सहसा निकल पड़ा कि कश्मीर जैसा कोई नहीं। यही नहीं जब वे वादी आए तो उनके पुराने संगी-साथियों ने उन्हें फिर से दुकान खोलने के लिए जोर दिया। ये वे लोग थे, जिनकी दुकानें उनकी दुकान के आसपास थीं। बाजार में लोगों ने उनकी दस्तारबंदी की, जो बहुत बड़ा सम्मान है। 

उन्हें इस बात का बेहद मलाल है कि कश्मीर में आतंकवाद के कारण राज्य से बाहर सभी कश्मीरियों की नकारात्मक छवि पेश की जा रही है। डाउन-टाउन के जेनाकदल में रहने वाले रोशनलाल मावा और उनका परिवार श्रीनगर के प्रभावशाली परिवारों में से एक था। अब उन्होंने 1990 में आतंकी हमलों की वजह से बंद की गई अपनी दुकान को फिर से शुरू किया है। कई स्थानीय युवाओं को रोजगार भी दिया।

कश्मीरियत आज भी पूरे कश्मीर में जिंदा है

उन्होंने अपनी दुकान का नाम रखा है जियो बाजार। पुराने संगी साथियों के बीच एक बार फिर अपने पुराने मोहल्ले और बाजार में अपना कारोबार शुरू करने से उत्साहित और रोमांचित नजर आ रहे रोशनलाल मावा ने कहा कि अपना घर, अपना शहर, अपने लोग, अपने ही होते हैं। बाहर जाकर आप चाहे जितनी भी तरक्की कर लें, आपके अंदर के खालीपन को कोई नहीं भर सकता। मावा ने कहा कि उन्होंने न सिर्फ पूरा हिन्दुस्तान बल्कि दुनिया के कई मुल्कों को देखा है, लेकिन उन्हें न तो कोई जगह कश्मीर जैसी खूबसूरत लगी और न कश्मीरियों की तरह कहीं सद्भाव है। कश्मीरियत आज भी पूरे कश्मीर में जिंदा है।

घाटी पहुंचने पर दोस्तों ने दस्तारबंदी

उन्होंने बताया कि जब वे वादी आए तो उनके पुराने संगी-साथियों ने फिर से दुकान खोलने के लिए जोर दिया। ये वे लोग थे, जिनकी दुकानें उनकी दुकान के आसपास थीं। बाजार में लोगों ने उनकी दस्तारबंदी की, जो बहुत बड़ा सम्मान है। बुजुर्ग कश्मीरी पंडित का कहना था कि कश्मीर में बंदूक, ङ्क्षहसा, पथराव, हड़ताल और मारकाट के बावजूद आज भी मुस्लिमों और कश्मीरी पंडितों में भाईचारा बरकरार है। बल्कि यह पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुआ है। उन्होंने बताया कि 31 अक्तूबर 1990 को उन पर आतंकियों ने चार गोलियां मारी थीं, लेकिन वे ईश्वर की कृपा से बच गए। इसके बाद वे दिल्ली में बस गए और कारोबार कर वहां बड़ा मकान भी बना लिया, लेकिन उन्हें घाटी की याद सताती रही। मावा कहते हैं कि उन्होंने अपनी जन्मभूमि से अलग होकर 29 साल किस तरह काटे हैं, इसे वे ही जानते हैं।

श्रीनगर का कारोबारी है बेटा

रोशन लाल के बेटे डॉ. संदीप कई साल से कश्मीर में ही रह रहे हैं। उनका यहां अच्छा खासा कारोबार है। जम्मू स्थित निजी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने वाला संदीप सात-आठ साल से कश्मीर की राजनीति में सक्रिय हुए हैं। तीन-चार साल पहले उन्होंने जम्मू कश्मीर रिकांसिलिएशन फ्रंट बनाया। यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी से भी कथित तौर पर संबंध रखने वाले डॉ. संदीप ने डॉ. संदीप मावा फाउंडेशन बनाया है। फाउंडेशन के बैनर तले डाउन-टाउन में प्रतियोगिता का भी आयोजन किया है।

सभी कश्मीरी पंडित घाटी लौटें, पर राजनीति से दूर रहें

जब बुजुर्ग कश्मीरी पंडित रोशनलाल मावा से यह पूछा गया कि क्या अन्य कश्मीरी पंडितों को घाटी लौटना चाहिए, तो उन्होंने तपाक से कहा कि हां क्यों नहीं। कश्मीर से ही तो कश्मीरी पंडित हैं, लेकिन उन्हें अपनी वापसी के नाम पर सियासत से दूर रहना चाहिए। मावा का मानना है कि 99 प्रतिशत कश्मीरी बहुत ही हमदर्द और सहृदय हैं। एक प्रतिशत ही होंगे जो हालात को लकर, कश्मीरियत को लेकर कुछ और सोचते होंगे। घर वापसी पर मैं बहुत संतुष्ट हूं।

Posted By: Rahul Sharma

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