श्रीनगर, नवीन नवाज। अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा लुप्तप्राय लाल हिरण अपने संरक्षित ठिकाने दाचीगाम नेशनल पार्क से बाहर निकलकर परंपरागत बसेरे को बहाल करने में जुट गया है। यह शुभ संकेत सेटेलाइट कॉलर्स ने दिया है। गुरेज-तुलैल तक चहलकदमी देख संरक्षण में जुटे लोग उत्साहित हैं। इस हिरण को कश्मीरी बारहसिंगा और हंगुल के नाम से भी जाना जाता है। यह कभी कश्मीर घाटी के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में पाया जाता था। 

वर्ष 1947 से पूर्व यहां इसकी संख्या तीन हजार बताई जाती थी। राज्य के अंतिम डोगरा शासक महाराज हरि सिंह ने कश्मीर में शिकार के लिए जो क्षेत्र चुना था, उसके मुताबिक उत्तरी कश्मीर में किशनगंगा दरिया के जल संग्रह क्षेत्र से लेकर दोरुस लोलाब, बांडीपोर, तुलैल, बालटाल व दाचीगाम से लेकर त्राल तक और किश्तवाड़ तक हंगुल का बसेरा था। इस समय हंगुल की संख्या महज 214 ही है, जो संरक्षण के तमाम प्रयासों के बीच दाचीगाम तक ही सिमट कर रह गए हैं।

 

सेटेलाइट कॉलर प्रोजेक्ट के प्रमुख डॉ. खुर्शीद अहमद ने बताया कि भारतीय वन्य जीव संस्थान और शेरे कश्मीर कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि के साथ मिलकर वन्य जीव संरक्षण विभाग ने ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम और सेटेलाइट टेलीमीटरी तकनीक पर काम करते हुए कुछ हंगुलों के गले में सेटेलाइट कॉलर लगाए हैं। इससे दाचीगाम के बाहर भी उनकी गतिविधियों की जानकारियां मिली हैं।

क्षेत्रीय वाइल्ड लाइफ वार्डन कश्मीर रशीद नक्काशा ने बताया कि हंगुल का पुराने क्षेत्र की तरफ जाने कारुझान उत्साहित करने वाला है। इसका मतलब है कि हंगुल अब दाचीगाम के बाहर भी अपने परंपरागत घरों की तरफ लौट रहा है। इससे हंगुल के संरक्षण और प्रजनन में सहायता होगी। हंगुल पर शोध करने वाले मंसूर नबी के अनुसार, करीब तीन दशक पहले तक दाचीगाम-वांगथ-तुलैल का इलाका हंगुल की आवाजाही का एक अहम रास्ता था, लेकिन बढ़ती आबादी और जंगलों के कटान के कारण हंगुल ने इस रास्ते का प्रयोग बंद कर दिया था। वह दाचीगाम में सीमित होकर रह गया।

अब राज्य सरकार दाचीगाम-वांगथ-तुलैल कॉरीडोर में हंगुल की सुरक्षित आवाजाही को यकीनी बनाने के लिए कुछ प्रभावी उपाय करने जा रही है। कमांडर एंड कंट्रोल सेंटर भी स्थापित किया जा रहा है। इस कॉरीडोर से हंगुल के गुजरने का पता चलते ही, सोनमर्ग-लेह हाईवे पर वाहनों की आवाजाही रोक दी जाएगी। 

 

हाल-ए-हंगुल

-रेड डाटा बुक ऑफ इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर एंड नेचुरल रिर्सोसेज (आइयूसीएन) ने वर्ष 1947 के बाद से ही हंगुल हिरण को लुप्तप्राय घोषित किया था।

-भारतीय उपमहाद्वीप में हंगुल लाल हिरण की अंतिम नस्ल है।

-हंगुल हिरण या कश्मीरी बारहसिंगा हिमालय की ऊंची पहाड़ियों, जंगलों और वादियों में मिलता है।  इसका वास कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले तक है। यह अक्सर दो से लेकर 18 के झुंड में रहते हैं।

-जम्मू-कश्मीर सरकार ने वल्र्ड वाइल्डलाइफ फंड के साथ मिलकर प्रोजेक्ट हंगुल शुरू किया।

-भारतीय डाक विभाग ने इसके संरक्षण को प्रोत्साहित करने के लिए 1982 में एक डाक टिकट शुरू किया।

- दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान से बाहर निकलकर नर और मादा हंगुल एक बार फिर गुरेज व तुलैल में अपने पंरपरागत बसेरे को बहाल करते पाए गए हैं। दशकों पहले गर्मियों के मौसम में इन्हें इस इलाके में अक्सर देखा जाता था। यह उत्साहित करने वाला संकेत है।

- रशीद नक्काशा, क्षेत्रीय वाइल्ड लाइफ वार्डन, कश्मीर

Posted By: Babita