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गुड न्यूज: कश्मीर के युवाओं के लिए खास प्रोग्राम तैयार, पहले पहचानेंगे तनाव का खतरा; फिर सिखाएंगे मन संभालना

By Naveen NawazEdited By: Dallu Slathia
Published: Wed, 07 Oct 2026 01:01 PM (GMT+05:30)

कश्मीर विश्वविद्यालय और पीजीआईएमईआर के शोधकर्ताओं ने कश्मीर के युवाओं में मानसिक तनाव, नशे और आत्मघाती विचारों की रोकथाम के लिए एक नया मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम तैयार किया है।

कश्मीर के युवाओं के लिए नया मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम। (फोटो- इंटरनेट मीडिया)

कश्मीर के युवाओं के लिए नया मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम। (फोटो- इंटरनेट मीडिया)

HighLights

  1. कश्मीर में युवाओं के लिए नया मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू।

  2. स्थानीय संस्कृति और भाषा को कार्यक्रम का आधार बनाया जाएगा।

  3. तनाव, नशे और आत्मघाती विचारों की प्राथमिक रोकथाम पर ध्यान।

नवीन नवाज, श्रीनगर। कश्मीर के युवाओं में मानसिक तनाव, नशे और आत्मघाती विचारों की बढ़ती चुनौती के बीच कश्मीर विश्वविद्यालय और पीजीआइएमईआर के शोधकर्ताओं ने स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम तैयार करने की पहल की है। 16 से 24 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं पर केंद्रित यह कार्यक्रम पहले जोखिम की पहचान करेगा और फिर उन्हें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी व्यावहारिक क्षमताएं विकसित करने में मदद देगा।

प्रभावी साबित होने पर इसे भविष्य में स्कूलों और कालेजों के मानसिक स्वास्थ्य पाठ्यक्रम का आधार बनाया जा सकता है। यह पहल इंडियन जर्नल आफ साइकोलॉजिकल मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन प्रोटोकाल का हिस्सा है।

शोधकर्ताओं का उद्देश्य मानसिक बीमारियों का उपचार करने के बजाय प्राथमिक रोकथाम पर जोर देना है, ताकि जोखिमग्रस्त युवाओं की पहचान समस्या गंभीर होने से पहले की जा सके।

स्थानीय भाषा और संस्कृति बनेगी आधार

शोधकर्ताओं के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम केवल सामान्य सलाह तक सीमित नहीं होना चाहिए। कश्मीर के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम में कश्मीरी भावनात्मक शब्दावली, स्थानीय प्रतीक, कश्मीरी कविता, प्रकृति, लोककथाओं और आध्यात्मिक परंपराओं को शामिल किया जाएगा।

कार्यक्रम में माइंडफुलनेस, आत्म-ज्ञान, भावनाओं का नियमन, सामाजिक संबंध बेहतर बनाने, नशे से निपटने और आत्म-नियंत्रण जैसे कौशल विकसित किए जाएंगे। ध्यान, कहानी, कला, आत्मचिंतन और निर्देशित अभ्यास इसके प्रमुख माध्यम होंगे।

इसकी विषय-वस्तु डायलेक्टिकल बिहेवियर थेरेपी (डीबीटी) के चयनित कौशलों पर आधारित होगी। सात प्रमुख मॉड्यूल में नियंत्रण की भावना, आत्म-ज्ञान, माइंडफुलनेस, भावनात्मक नियंत्रण, पारस्परिक प्रभावशीलता, नशे से निपटना और मनो-आध्यात्मिक कल्याण शामिल हैं।

पहले पहचान, फिर हस्तक्षेप

कार्यक्रम के पहले चरण में यह पता लगाया जाएगा कि कश्मीर के युवाओं में मानसिक परेशानी, नशे और आत्मघाती व्यवहार के पीछे कौन से स्थानीय जोखिम कारक हैं। इसके लिए मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों, धार्मिक नेताओं, पुलिसकर्मियों और वकीलों सहित विभिन्न वर्गों से जानकारी ली जाएगी।

इसके बाद चयनित उच्च माध्यमिक स्कूलों और कालेजों में छात्रों की स्क्रीनिंग की जाएगी। नशे के जोखिम, अवसाद और चिंता का आकलन मान्य परीक्षणों के माध्यम से होगा। मध्यम या अधिक जोखिम वाले युवाओं को प्रस्तावित हस्तक्षेप में शामिल किया जाएगा।

अध्ययन में दो उच्च माध्यमिक स्कूलों और दो कालेजों से कुल करीब 60 युवाओं को शामिल करने की योजना है। प्रत्येक संस्थान से 15 प्रतिभागी लिए जाएंगे। कार्यक्रम से पहले और आठ सप्ताह बाद प्रतिभागियों का दोबारा आकलन किया जाएगा।

चार सप्ताह में 15 सत्र

प्रस्तावित कार्यक्रम चार सप्ताह का होगा और इसमें कुल 15 सत्र होंगे। आठ सत्र एक-एक घंटे के तथा सात सत्र लगभग 80 मिनट के होंगे। इसे लागू करने से पहले विशेषज्ञों द्वारा इसकी विषय-वस्तु की वैधता और व्यवहारिकता की जांच की जाएगी।

शोधकर्ता यह भी देखेंगे कि हस्तक्षेप के बाद प्रतिभागियों में अवसाद, चिंता और नशे के जोखिम में कितना बदलाव आता है तथा माइंडफुलनेस, भावनात्मक नियंत्रण और सामाजिक कौशल में कितना सुधार होता है।

जागरूकता बढ़ी, मदद लेने में झिझक कायम

कश्मीर के युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद विशेषज्ञों से मदद लेने में सामाजिक कलंक अब भी बड़ी बाधा है। कई युवा परेशानी की स्थिति में परिवार पर निर्भर रहते हैं और पेशेवर सहायता लेने से बचते हैं। ऐसे में स्कूल और कालेज स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य की समझ विकसित करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

शोधकर्ताओं ने हालांकि स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन प्रोटोकाल है, अंतिम परिणाम नहीं। कार्यक्रम कितना प्रभावी होगा, यह अध्ययन पूरा होने के बाद ही पता चलेगा। एकल समूह पर पहले और बाद के आकलन तथा सीमित संस्थानों में अध्ययन इसकी प्रमुख सीमाएं हैं।

इसके बावजूद, यदि परिणाम सकारात्मक रहे तो यह कश्मीर में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का जोर उपचार से आगे बढ़ाकर समय रहते रोकथाम और शुरुआती हस्तक्षेप की ओर ले जाने का आधार बन सकता है।