गुलमर्ग-पहलगाम से आगे भी है कश्मीर! 10,500 फीट पर छिपा है ‘किंग ऑफ मेडोज’, जानें तोशा मैदान कैसे पहुंचें
कश्मीर में स्थित तोशा मैदान, जो कभी तोपखाने का अभ्यास क्षेत्र था, अब अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व के ...और पढ़ें

कश्मीर में 10,500 फीट पर बसा है तोशा मैदान।
HighLights
बड़गाम का तोशा मैदान, 'राजाओं का मैदान', प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर।
50 साल तक तोपखाना अभ्यास क्षेत्र रहा, अब इको-टूरिज्म हब।
सुरक्षा कारणों से जुलाई 2026 तक पर्यटकों के लिए बंद।
अंचल सिंह, जम्मू। कश्मीर घाटी की हसीन वादियों में कई ऐसे अनछुए ठिकाने हैं, जो अपनी कुदरती खूबसूरती और ऐतिहासिक गाथाओं से पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इन्हीं में से एक है बड़गाम जिले में स्थित तोशा मैदान, जिसे स्थानीय भाषा में किंग आफ मेडोज यानि चारागाहों का राजा कहा जाता है।
समुद्र तल से लगभग 10,500 फीट की ऊंचाई पर पीर-पंचाल पर्वतमाला की गोद में फैला यह विशालकाय मखमली मैदान कभी तोपों की गूंज और गोलों की खौफनाक आवाजों के लिए जाना जाता था। लेकिन आज यह बदहाली और खौफ के साए से बाहर निकलकर दक्षिण एशिया के सबसे खूबसूरत और सुरक्षित इको-टूरिज्म स्थलों में अपनी पहचान बना रहा है।
तोशा मैदान त्रासदी से पुनर्जन्म की एक जीती-जाती मिसाल है। कंक्रीट के पक्के निर्माणों से दूर रखकर इसे प्राकृतिक रूप में ही संरक्षित करने की योजना है। यदि आप कश्मीर की पारंपरिक व्यावसायिक भीड़भाड़ जैसे गुलमर्ग या पहलगाम से अलग किसी शांत, प्राचीन और लुभावनी जगह की तलाश में हैं, तो तोशा मैदान की यह यात्रा आपके लिए जीवनभर का यादगार अनुभव बन सकती है। स्थानीय लोगों की मानें तो कई गुलमर्ग, दूध पत्थरी, पहलगाम जैसे मैदान इसमें समा सकते हैं। यह बहुत बड़ा है।

'तू शाह मैदान' से तोशा मैदान
तोशा मैदान शब्द का मूल उद्गम फारसी के शब्द 'तू शाह मैदान' से माना जाता है, जिसका अर्थ होता है, "राजाओं का मैदान"।
क्षेत्रफल और विस्तार: लगभग 75 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह मैदान ग्रीष्मकाल में हरे-भरे कालीन की तरह बिछ जाता है।
प्राकृतिक दीवार: इसके चारों ओर फैले देवदार के गगनचुंबी पेड़ और पृष्ठभूमि में दिखती बर्फ से ढकी पीर-पंचाल की चोटियां इसे एक अद्भुत दृश्य प्रदान करती हैं।
सदियों पुराना ऐतिहासिक और सामरिक मार्ग
तोशा मैदान सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का एक अहम पन्ना है।
मुगलकालीन पड़ाव: मुगल सम्राट पंजाब और पुंछ के रास्ते कश्मीर घाटी में प्रवेश करने के लिए इसी सबसे छोटे व्यापारिक मार्ग का उपयोग करते थे। मुगलों ने यहां आराम करने के लिए 'दमदम' नाम की सात मंजिला इमारत भी बनवाई थी, जिसके अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं।
हमलावरों को रोका: इतिहासकार कल्हण की राजतरंगिणी में भी तोशा मार्ग का उल्लेख मिलता है। 11वीं सदी में महमूद गजनवी और 19वीं सदी की शुरुआत (1814) में महाराजा रणजीत सिंह ने इसी रास्ते से कश्मीर पर कब्जा करने की कोशिश की थी, लेकिन लोहरकोट किले की किलेबंदी के कारण उन्हें नाकाम होना पड़ा था।
1964 से 2014: जब तोशा मैदान बना 'आर्टिलरी फायरिंग रेंज'
तोशा मैदान के इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय साल 1964 में शुरू हुआ, जब जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस खूबसूरत 11,600 हेक्टेयर इलाके को भारतीय सेना और सुरक्षा बलों को आर्टिलरी (तोपखाने) अभ्यास के लिए 50 साल की लीज पर दे दिया।

संघर्ष और बदलाव का दौर
अप्रभावित जीवन व जनहानि: 50 वर्षों तक तोपों के गोलों और जिंदा विस्फोटकों के कारण इस इलाके में दर्जनों स्थानीय नागरिकों (चरवाहों और बच्चों) को अपनी जान गंवानी पड़ी।
तोशा मैदान बचाओ फ्रंट (टीबीएफ): 2009 के बाद स्थानीय ग्रामीणों, कार्यकर्ताओं और डा. शेख गुलाम रसूल जैसे समाजशास्त्रियों ने मैदान को खाली कराने के लिए एक अहिंसक जन-आंदोलन शुरू किया।
आजादी और सफाई अभियान: 2014 में लीज खत्म होने पर सरकार ने इसे आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। सेना ने आपरेशन मिशन क्लीन तोशा मैदान चलाकर दो सालों में पूरे इलाके से बिन फटे गोलों को निष्क्रिय किया और मई 2016 में इसे जनता और पर्यटकों के लिए खोल दिया गया।
प्रमुख आकर्षण और साहसिक गतिविधियां
वर्तमान में तोशा मैदान विकास प्राधिकरण इसे एक स्थायी इको-टूरिज्म हब के रूप में विकसित कर रहा है।
ट्रेकिंग और हाइकिंग : बसमई गली (13,000 फीट) और पूंछ गली जैसे ट्रैकिंग रूट। शंगलीपोरा से तोशा मैदान का ट्रेक सबसे लोकप्रिय है।
गुज्जर-बकरवाल संस्कृति : गर्मियों में अपनी मवेशियों को चराने आने वाले घुमंतू गुज्जर समुदाय के मिट्टी के घर (कोठा) और उनकी जीवनशैली का अनुभव।
सीताहरण गाँव (रामायण कनेक्शन) : तोशा मैदान से महज 13 किमी दूर स्थित सीताहरण गांव, जिसे धार्मिक मान्यता के अनुसार वनवास काल से जोड़ा जाता है।
कैंपिंग और एस्ट्रो-टूरिज्म : प्रदूषण रहित वातावरण और साफ आसमान के कारण यहां रात में तारों को निहारने का अनुभव बेहद खास होता है।

फूलों की चादर
हरियाली से भरपूर ताेशा मैदान में पैदल चलने का अनुभव अद्भुत रहता है। यहां मैदान में छोटे-छोटे हरे गुलाब जैसे फूल बिछले हुए हैं। मानो प्रकृति आपके चरणों में फूलों का बिछा कर आपका स्वागत कर रही है। स्वर्ग सा एहसास करवाने वाले तोशा मैदान पर चलने पर यूं लगता है जैसे किसी गद्दे पर चल रहे हों। तोशा मैदान में विभिन्न पहाड़ियों के बीच गटमर्ग, कुरहा बरिवाल, बसमगली, बटदारी पहाड़ शुपनार जैसे मैदान हैं।
करीब 15 हजार भेड़ें
हजारों एकड़ में फैले तोशा मैदान में अक्सर भेड़ें देखी जा सकती है जिन्हें चरवाहे चरा रहे होते हैं। करीब 15 हजार भेड़ें तोशा मैदान के विभिन्न मैदानों में विचरती दिख जाती हैं।
बताया जाता है कि प्रत्येक भेड के लिए चरवाहे को मौजूदा समय में 500 रुपये प्रति वर्ष दिए जाते हैं। करीब 30 कोठों में यह चरवाहे परिवारों से दूर रहते हैं। जो पूरा दिन भेड़ों को चराते हैं और फिर शाम ढलते ही भेड़ों को बाड़े में खडा करके सो जाते हैं।
सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध
तोशा मैदान में आज भी सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध हैं। पहलगाम हमले के बाद बंद किए गए तोशा मैदान को अभी तक यानि जुलाई 2026 तक पर्यटकों के लिए खोला नहीं गया है।
सीताहरण गांव के नजदीक से लेकर तोशा मैदान तक जगह-जगह सुरक्षा प्रहरी तैनात हैं। किसी भी पर्यटक को जाने की अनुमति नहीं है। स्थानीय लोग अथवा कामकाज करने वालों को पूरी पड़ताल के बाद जाने दिया जाता है। सुरक्षा एजेंसियां पूरा रिकार्ड रखती हैं।
तोशा मैदान कैसे पहुंचे और कब जाएं?
सर्वोत्तम समय: मई से अक्टूबर के बीच का समय तोशा मैदान की यात्रा के लिए सबसे मुफीद माना जाता है। इस दौरान मौसम सुहावना रहता है और मैदानों में रंग-बिरंगे जंगली फूल खिले होते हैं।
श्रीनगर से दूरी: लगभग 45 से 50 किलोमीटर।
रूट: श्रीनगर-बड़गाम-खाग/अरीजल-शंगलीपोरा-सिताहरण-तोशा मैदान।
महत्वपूर्ण : शंगलीपोरा या सिताहरण के आगे का रास्ता दुर्गम होने के कारण 4x4 वाहनों या पैदल ट्रेक के जरिए ही पूरा किया जाता है।
