श्रीनगर, नवीन नवाज। कॉलेज में पहुंचने तक उसने बमुश्किल कोई खेल खेला था। बस एक जिद थी अपनी पहचान बनाने की। कॉलेज में कुछ लड़कियों को हॉकी खेलते देखा तो उसे लगा की यह ग्राउंड उसे भी बुला रहा है। एक बार स्टिक हाथ में थामी तो फिर सब कुछ बदल गया। कश्मीर की अलगाववादी सियासत का केंद्र बन चुके लालचौक की भीड़ से मात्र 12 किलोमीटर दूर करालपोरा की यह बेटी इनायत फारुक अब सिर्फ साधारण छात्रा नहीं रही। हॉकी अब इनायत की पहचान बन गई और उस पहचान ने रुढि़यों को तोड़कर आगे बढ़ने की चाह रखने वाली कश्‍मीर की बेटियों काे एक सपना दे दिया।

आज वह उन बेटियों की प्रेरणा है और नई पीढ़ी की एक उम्‍मीद। तीन दशकों से आतंकवाद, कट्टरपंथियों के तालिबानी फरमान से सबसे ज्यादा प्रभावित कश्मीर की महिलाओं की उस पीढ़ी का नेतृत्व कर रही है, जो रुढि़वाद की बेड़ियों को तोड़ आगे बढ़ने के लिए तैयार खड़ी हैं।

वह कश्‍मीर में महिला हाॅकी का रोल मॉडल बन गई है, क्योंकि 25 साल में घाटी से नेशनल हाकी के किसी कैंप और सीनियर हॉकी प्रतियोगितयों में हिस्सा लेने वाली वह एकमात्र लड़की है। फिलहाल वह एक निजी स्कूल में हॉकी से अपना जीवन तराशने का प्रयास कर रही लड़कियों की नई पौध तैयार करने में जुटी है। इनायत बताती है कि यह बदलाव अचानक सा उसकी जिंदगी में आया। 

श्रीनगर में मौलाना आजाद रोड स्थित महिला कालेज में दाखिला लेने से पहले मैंने कभी हाॅकी नहीं पकड़ी थी। किसी को सामने खेलते भी नहीं देखा था। टीवी पर एक-आध ही कोई मैच देखा था। वह भी मुझे पूरी तरह याद नहीं। घर में भी काेई नहीं खेलता था।' अपनी पारिवारिक स्थिति के बारे में बताते हुए वह आगे कहती हैं, 'मिडिलक्लास परिवार है और वह भी कश्मीर के चाडूरा (बड़गाम) में। समझ सकते हैं कि स्थिति क्या होगी।'

हॉकी के इस जुनून के बारे में वह बताती हैं- कालेज ग्राउंड में कुछ लड़कियों को हाॅकी खेलते देखा। लगा ग्राउंड उसे भी बुला रहा है। बस थाम ली स्टिक। उसके बाद फिर बहुत कुछ बदल गया। यह बदलाव इतना आसान भी नहीं था। पहली लड़ाई घर से ही थी। इनायत बताती हैं कि कालेज के भीतर तो ठीक था लेकिन घर में बात बिगड़ गई। पिता नाराज हुए कि यह कौन सा खेल है। उनका मानना था कि हॉकी लड़कियों के लिए नहीं है। परिवार, पड़ोस और समाज के सवालों की फेहरिस्‍त थी। घर से हॉकी लेकर निकलती थी तो लोग हैरानी से देखते हुए आपस में बात करते थे। जानती थी कि मेरे बारे में बात कर रहे हैं, लेकिन मैं नजर अंदाज कर देती थी। शुरुआती विरोध के बाद घर से साथ मिला।

पेशे से लोहार उसके पिता फारुक अहमद ने कहा कि मैंने ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि इनायत हमारा नाम यूंं रोशन करेगी। डरता था कि क्या खेल खेल रही है। मैने खुद कभी हॉकी नहीं पकड़ी थी। बाकी यहां के हालात आप समझ सकते हैं। खुदा का शुक्र है कि वह मेरी बेटी को कामयाब कर रहा है।

इनायत ने कहा कि कालेज में मैं जल्द ही टीम का हिस्सा बन गई। मेरे खेल को देखते हुए डिवीजनल स्पोर्ट्स आफिसर व अन्य खेल अधिकारियों ने मुझे प्रोत्साहित किया। दो साल पहले वर्ष 2017 में मैने पटियाला में नेताजी सुभाष इंस्टीच्यूट आॅफ स्पाेर्ट्स में आयोजित कैंप में हिस्सा लिया। वहां से हेल्थ एंड फिटनेस में सर्टिफिकेट कोर्स किया। पिछले साल मैं जम्मू में हुए नेशनल ट्रायल में हिस्सा लेने भी गई। लड़ाई हर कदम पर जारी थी। कश्‍मीर के इस परिवार के लिए सक कुछ आसान नहीं थी। इनायत बताती है कि जब पहली बार कश्मीर से बाहर खेलने जाना था तो मां-बाप ने कड़ा एतराज किया। मुझे लगा था कि हाॅकी अब मेरे हाथ से ही नहीं मेरी जिंदगी से भी छूट जाएगी। लेकिन मेरे कोच ने मां-बाप से बात की। उसके बाद से आज तक मेरे घर वालों ने कभी विरोध नहीं किया। मैने बंगलुरु में राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपनी राज्य का प्रतिनिधित्‍व किया। उसके बाद बीते साल मैंने रांची में भी खेला।

कश्मीर में खेल सुविधाओं का जिक्र करते हुए वह बताती हैं कि यहां सुविधाओं का अभाव है। अभ्यास करने के लिए एक सिंथेटिक टर्फ भी नहीं है। जब मैं पहली बार बाहर खेलने गयी तो वहां दूसरी लडकियों का खेल देखकर हैरान रह गई थी। मुझे उस दिन अहसास हुआ कि मैं बहुत पीछे हूं, मुझे कड़ी मेहनत करनी है। भविष्य की योजनाओं का जिक्र करते हुए उसने कहा कि मैं एक दिन राष्ट्रीय टीम का अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रही हूं। मैं चाहती हूं कि यहां हाॅकी खेलने वाली दुनिया की सबसे बेहतर लड़कियां तैयार करने वाली कोच बनूं।

कोच तेजिंदर सिंह कहते हैं कि इनायत की सफलता के बाद और बेटियां भी सामने आ रही हैं। अब हमारी बेटियां राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कैंप में जा रही हैं।

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Posted By: Preeti jha

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