जम्मू-कश्मीर में डेंगू के 1200 मामले, बुखार उतरते ही न हो जाएं लापरवाह; ये 6 लक्षण दिखें तो तुरंत पहुंचें अस्पताल
Dengue Warning Signs: जम्मू-कश्मीर में इस साल डेंगू के मामलों में कमी आई है, लेकिन विशेषज्ञ अभी भी सतर्क रहने ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर में डेंगू का खतरा बरकरार, बचाव के उपाय अपनाना जरूरी। (फाइल फोटो)
HighLights
जम्मू-कश्मीर में डेंगू के मामले घटे, पर खतरा अभी भी बरकरार।
बुखार उतरने के बाद भी मरीज की हालत बिगड़ सकती है।
मच्छरों के प्रजनन पर रोक लगाना डेंगू नियंत्रण का उपाय।
राज्य ब्यूरो, जम्मू। जम्मू-कश्मीर में इस साल डेंगू के करीब 1,200 मामले सामने आए हैं। पिछले कुछ वर्षों की तुलना में संक्रमण के आंकड़ों में कमी जरूर आई है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे खतरे के टलने का संकेत मानने से आगाह कर रहे हैं। डाक्टरों के मुताबिक, डेंगू में लापरवाही और समय पर इलाज नहीं मिलना मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। खासकर बुखार उतरने के बाद मरीज की स्थिति पर नजर रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि इसी दौरान कुछ मामलों में गंभीर जटिलताएं उभर सकती हैं।
पिछले वर्षों के आंकड़े संक्रमण की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। जम्मू-कश्मीर में वर्ष 2022 में डेंगू के 8,269 मामले दर्ज किए गए थे, जो अब तक के सर्वाधिक आंकड़ों में शामिल हैं। उस साल इस बीमारी से 18 लोगों की मौत हुई थी।
वर्ष 2023 में 6,403, वर्ष 2024 में करीब 7,000 और वर्ष 2025 में लगभग 3,000 मामले सामने आए। इसके मुकाबले इस साल अब तक करीब 1,200 मामले दर्ज होना राहत की बात है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बचाव के उपायों में ढिलाई संक्रमण को दोबारा बढ़ने का मौका दे सकती है।
बुखार उतरना खतरे के खत्म होने की गारंटी नहीं
डाक्टरों के अनुसार, डेंगू के लक्षण आमतौर पर संक्रमित मच्छर के काटने के चार से दस दिन बाद दिखाई देते हैं। तेज बुखार, सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में पीड़ा, उल्टी, मतली, त्वचा पर चकत्ते और अत्यधिक कमजोरी इस बीमारी के सामान्य लक्षण हैं। हालांकि, असली चिंता तब बढ़ती है जब बुखार कम होने के बावजूद मरीज की हालत बिगड़ने लगती है।
इन लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज
पेट में तेज दर्द, लगातार उल्टी, सांस लेने में परेशानी, नाक या मसूड़ों से खून आना, उल्टी/मल में खून दिखाई देना और असामान्य थकान जैसे लक्षण गंभीर स्थिति का संकेत हो सकते हैं।
मरीज में बेचैनी या चिड़चिड़ापन भी खतरे की घंटी है। ऐसे लक्षणों को सामान्य कमजोरी समझकर टालना भारी पड़ सकता है। चिकित्सकों ने स्पष्ट किया है कि चेतावनी के संकेत दिखाई देने पर बिना देरी चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
प्लेटलेट्स में गिरावट से लेकर अंगों को नुकसान तक का खतरा
डेंगू का गंभीर रूप रक्तस्राव, रक्त वाहिकाओं से तरल पदार्थ के रिसाव और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। कुछ मरीजों में प्लेटलेट्स की संख्या भी कम हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, दोबारा डेंगू संक्रमण होने पर, खासकर अलग वायरस प्रकार से संक्रमण की स्थिति में, गंभीर बीमारी का जोखिम बढ़ सकता है।
डेंगू के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार उपलब्ध नहीं है। ऐसे में समय पर जांच, पर्याप्त तरल पदार्थों का सेवन और चिकित्सकीय निगरानी उपचार के अहम हिस्से हैं। डॉक्टरों ने बिना चिकित्सकीय सलाह दवाएं लेने से बचने की भी हिदायत दी है। गंभीर लक्षणों की स्थिति में घरेलू उपचार पर निर्भर रहने के बजाय अस्पताल पहुंचना जरूरी है।
घर में पानी जमा न होने दें
डेंगू पर नियंत्रण की सबसे बड़ी चुनौती मच्छरों के प्रजनन को रोकना है। एडीज मच्छर साफ दिखाई देने वाले थोड़े से ठहरे पानी में भी पनप सकते हैं। घरों में रखे कूलर, गमले, बाल्टियां, पुराने टायर, खुले बर्तन और पानी जमा करने वाली छोटी वस्तुएं इनके प्रजनन का कारण बन सकती हैं।
विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि वे अपने घरों और आसपास नियमित जांच करें तथा जमा पानी को तुरंत हटाएं। पानी की टंकियों और भंडारण के बर्तनों को ढककर रखना, कूलरों और अन्य कंटेनरों की सफाई करना और आसपास कचरा जमा नहीं होने देना जरूरी है। मच्छर भगाने वाले उत्पादों का इस्तेमाल, पूरी बांह के कपड़े पहनना तथा दरवाजों और खिड़कियों पर जाली लगाना भी बचाव में मददगार है।
डेंगू फैलाने वाले एडीज मच्छर दिन के समय भी सक्रिय रहते हैं। इसलिए केवल रात में मच्छरों से बचाव करना पर्याप्त नहीं है। दिन में आराम करते समय भी मच्छरदानी का इस्तेमाल संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
अस्पतालों में उपचार की व्यवस्था, रोकथाम पर जोर
जम्मू के सरकारी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) ने डेंगू मरीजों के उपचार के लिए अस्पताल संबंधी व्यवस्थाओं और प्लेटलेट्स की उपलब्धता सुनिश्चित किए जाने की जानकारी दी है। हालांकि, विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि अस्पतालों में उपचार की व्यवस्था के साथ संक्रमण की रोकथाम को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इस साल मामलों में आई गिरावट राहत जरूर देती है, लेकिन यह सतर्कता कम करने का आधार नहीं हो सकती। डेंगू पर प्रभावी नियंत्रण के लिए प्रशासनिक प्रयासों के साथ आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है।
जब तक घरों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर पानी जमा होने से रोकने तथा साफ-सफाई बनाए रखने के उपाय लगातार नहीं अपनाए जाएंगे, तब तक संक्रमण के दोबारा बढ़ने का खतरा बना रहेगा
