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जम्मू-कश्मीर में खेत-बागानों पर निर्माण की छूट, नए कानून पर PDP ने उठाए सवाल; विशेषज्ञों को भूकंप-बाढ़ का डर

By Naveen NawazEdited By: Dallu Slathia
Published: Mon, 12 Oct 2026 02:02 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर में कृषि भूमि पर व्यावसायिक निर्माण की अनुमति देने वाले नए कानून पर सियासी विवाद गहरा गया है। पीडीपी ...और पढ़ें

महबूबा मुफ्ती ने कृषि भूमि पर व्यावसायिक निर्माण की छूट पर जताई चिंता। (फाइल फोटो)

महबूबा मुफ्ती ने कृषि भूमि पर व्यावसायिक निर्माण की छूट पर जताई चिंता। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. कृषि भूमि पर व्यावसायिक निर्माण की अनुमति से विवाद।

  2. पीडीपी ने कानून को बताया जमीन से विश्वासघात।

  3. विशेषज्ञों को भूकंप और बाढ़ के खतरे बढ़ने की चिंता।

नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में कृषि और बागवानी भूमि पर व्यावसायिक निर्माण की अनुमति देने वाले नए कानून को लेकर सियासी विवाद गहरा गया है। पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने इसे जमीन, खाद्य सुरक्षा और लोगों की जिंदगी के साथ विश्वासघात करार देते हुए सरकार से जवाब मांगा है। वहीं, विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों ने चेताया है कि निर्माण नियमों में ढील से भूकंप, बाढ़ और पर्यावरण संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक, 2026 मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 28 सितंबर को विधानसभा के शरदकालीन सत्र में पेश किया था। बाद में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने इसे मंजूरी दे दी। कानून का उद्देश्य कारोबार और निर्माण संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाना है, लेकिन इसके प्रावधानों पर सवाल उठ रहे हैं।

आठ मंजिला इमारतों और मॉल के निर्माण का रास्ता खुला

नए प्रावधानों के तहत कुछ शर्तों के साथ 24 मीटर तक ऊंची, यानी करीब आठ मंजिला आवासीय इमारतें बनाई जा सकेंगी। इनका निर्मित क्षेत्र 5,000 वर्ग मीटर तक हो सकता है। निर्धारित शर्तों के तहत सरकारी मंजूरी की पारंपरिक प्रक्रिया के बजाय सरकार से अनुमोदित सलाहकार का प्रमाणपत्र मान्य होगा। कुछ निर्धारित आकार के व्यावसायिक मॉल को भी अलग से सरकारी मंजूरी लेने से छूट दी गई है।

कृषि और बागवानी भूमि पर कई व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति का रास्ता भी खुल गया है। हालांकि, रेड और ऑरेंज श्रेणी के उद्योगों को इससे बाहर रखा गया है। वर्ष 2022 के नियमों के तहत गैर-कृषि इस्तेमाल के लिए जिला स्तर के अधिकारियों की अनुमति और समिति की सिफारिश जरूरी थी।

भूकंप और मिट्टी के द्रवीकरण का खतरा

जम्मू-कश्मीर भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है। वर्ष 2005 में आए 7.6 तीव्रता के भूकंप में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में करीब 75,000 और जम्मू-कश्मीर में लगभग 1,400 लोगों की मौत हुई थी।

वर्ष 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में श्रीनगर के 87 वार्डों की मिट्टी का विश्लेषण किया गया। इसमें कई इलाकों में भूकंप के दौरान मिट्टी के द्रवीकरण का उच्च से गंभीर जोखिम सामने आया। इस स्थिति में पानी से संतृप्त ढीली मिट्टी अपनी मजबूती खो सकती है, जिससे इमारतों की नींव प्रभावित होती है। झेलम के आसपास की जलोढ़ मिट्टी और उथला भूजल इस खतरे को बढ़ा सकते हैं।

पूर्व मुख्य नगर नियोजक और आपदा जोखिम प्रबंधन विशेषज्ञ इफ्तिखार अहमद हकीम ने कहा कि पर्याप्त खुली जगह और सुरक्षा मानकों के बिना ऊंची इमारतों के निर्माण से आपातकालीन सेवाओं, यातायात और बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ सकता है।

मास्टर प्लान और बाढ़ सुरक्षा पर चिंता

विशेषज्ञों के मुताबिक, निर्माण की अनुमति देते समय सड़कों, पेयजल, जल निकासी, आर्द्रभूमियों और बाढ़ का पानी सोखने वाले क्षेत्रों का ध्यान रखना जरूरी है। वर्ष 2014 की कश्मीर बाढ़ में करीब दस लाख लोग विस्थापित हुए थे और श्रीनगर सहित कई इलाके जलमग्न हो गए थे।

एनवायरनमेंटल पॉलिसी ग्रुप के संयोजक फियाज बख्शी ने कानून की धारा 22 के तहत नियमों में छूट देने के लिए सरकार को मिली व्यापक शक्तियों पर चिंता जताई। पूर्व नौकरशाह खुर्शीद गनई के नेतृत्व वाले 'ग्रुप ऑफ कंसर्न्ड सिटिजन्स' ने भी अधिनियम की अनुसूचियों 2, 3 और 5 के कुछ प्रावधानों की समीक्षा की मांग की है।

कृषि और बागवानी पर भी पड़ सकता है असर

महबूबा मुफ्ती ने कहा कि विकास के नाम पर बागानों और कृषि भूमि को व्यावसायिक इमारतों के लिए खोलना भविष्य में गंभीर संकट पैदा कर सकता है। पीडीपी विधायक वहीद उर रहमान पारा ने भी पर्यावरण और बाढ़ सुरक्षा से समझौता किए बिना निवेश को बढ़ावा देने की जरूरत बताई।

जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रही खेतीबागवानी

वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में लगभग 10.97 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि थी। नवंबर 2025 तक बागवानी क्षेत्र करीब 3.47 लाख हेक्टेयर में फैला था और इससे सात लाख से अधिक परिवार जुड़े थे। कृषि क्षेत्र का प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 10 प्रतिशत योगदान है और इससे सालाना करीब 10,000 करोड़ रुपये की आय होने का अनुमान है।

विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों ने मांग की है कि सरकार कानून लागू करते समय भूकंपरोधी निर्माण, बाढ़ सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और मास्टर प्लान के नियमों को प्राथमिकता दे, ताकि विकास के साथ लोगों की सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था भी सुरक्षित रह सके।