जम्मू, रोहित जंडियाल। दो मई 1988 का वह काला दिन जब भ्रष्ट तंत्र की लापरवाही के कारण जम्मू का इकलौता बच्चों का अस्पताल धाराशायी हो गया। इसके मलबे में कई बच्चों की चीखें दबकर रह गई। यह ऐसा दिन था जिसकी काली छाया आज भी जम्मू के बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। तीन दशक बाद भी किसी सरकार ने जम्मू में कभी चिल्ड्रेन अस्पताल बनाने का प्रयास नहीं किया। यही कारण है कि जम्मू संभाग में बच्चे आज इलाज के लिए दरबदर हो रहे हैं।

1973 में जम्मू में राजकीय मेडिकल कॉलेज की स्थापना के बाद पहले बाल रोग विभाग श्री महाराजा गुलाब सिंह अस्पताल में था। बाद में इसे अलग से अंबफला में बने अस्पताल में शिफ्ट कर दिया। 1975 में अंबफला में जम्मू का पहला चिल्ड्रेन अस्पताल खोला गया। उस समय अस्पताल की क्षमता मात्र 30 बिस्तरों की थी। बाद में इसे बढ़ाकर 50 कर दिया। तीन मंजिला इस अस्पताल का निर्माण साल 1985 में पूरा हो गया। कुछ वर्षों में ही नए बने कांप्लेक्स में दरारें आ गई। दो मई सुबह उस अस्पताल में 100 बच्चे इलाज करवा रहे थे। साथ में उनके अभिभावक भी थे। अस्पताल में नियुक्त एक डॉक्टर ने इमारत में दरार देखी। उन्होंने तुरंत एक वार्ड खाली करवा दिया।

यह सब इतनी तेजी के साथ हुआ कि पूरा अस्पताल खाली नहीं करवाया जा सका। नया कांप्लेक्स मलबे के ढेर में तबदील हो गया। कई बच्चों और उनके अभिभावकों की चीखो-पुकार मलबे के ढेर में तबदील हो गई। बचाव के लिए सेना पहुंची, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। कई बच्चे दम तोड़ चुके थे। उस समय अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. डीआर मन्हास थे। यह हादसा जम्मू में बच्चों के स्वास्थ्य के लिहाज से इतना भयानक साबित हुआ कि इसके बाद कभी भी जम्मू में चिल्ड्रेन अस्पताल बनाने के लिए काम नहीं हुआ। इस हादसे के तीन साल बाद मेडिकल कॉलेज को बख्शीनगर में शिफ्ट कर दिया गया। बाल रोग विभाग फिर से एसएमजीएस अस्पताल में ही रहा। अलग चिल्ड्रेन अस्पताल के लिए कोई काम नहीं हुआ। यही कारण है कि आज जम्मू में बच्चों को इलाज के लिए परेशान होना पड़ता है।

जम्मू के पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डॉ. बीएस पठानिया का कहना है कि जम्मू में जिस प्रकार से एसएमजीएस अस्पताल में मरीजों का बोझ है, उसे देखते हुए अलग से बच्चों का अस्पताल होना चाहिए। आठवें दशक में जब जम्मू में बच्चों का अस्पताल होता था तो एक साल उन्होंने इसमें काम किया है। अलग अस्पताल होने से सुविधाएं भी बढ़ती हैं। सरकार के लिए कुछ करोड़ खर्च करना बड़ी बात नहीं है। अगर सरकार अलग अस्पताल बनाती है तो इससे बच्चों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी।

श्रीनगर में अलग से है अस्पताल

श्रीनगर में बच्चों के लिए अलग से जीबी पंत अस्पताल है। इस अस्पताल में 150 बिस्तरों की क्षमता है। इसका अभी विस्तार किया जा रहा है। पिछले साल 29 मई को राज्य प्रशासनिक परिषद ने श्रीनगर के बेमिना स्थित अस्पताल को चिल्ड्रेन अस्पताल में तब्दील करने को मंजूरी दी है। इस अस्पताल में 500 बिस्तरों की क्षमता होगी। सबसे पहले श्रीनगर में हजूरी बाग में बच्चों का अस्पताल होता था। इसे बाद में जीबी पंत अस्पताल में शिफ्ट कर दिया था। जम्मू में अभी तक सरकार की अलग से बच्चें का अस्पताल बनाने की योजना नहीं बन पाई। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के वित्तीय आयुक्त से बात करने का प्रयास किया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी यह जरूर मानते हैं कि जम्मू में अलग से बच्चों का अस्पताल होना चाहिए।

खली चिल्ड्रेन अस्पताल की कमी

ऊधमपुर जिले के रामनगर में अज्ञात बीमारी से दस बच्चों की मौत और सात के गंभीर रूप से बीमार होने पर जम्मू में अलग चिल्ड्रेन अस्पताल की कमी खल रही है। सात में से चार बच्चे पीजीआइ चंडीगढ़ और डीएमसी लुधियाना में इलाज करवा रहे हैं। अगर जम्मू में ही अलग अस्पताल होता तो शायद यह नौबत नहीं आती।

Posted By: Rahul Sharma

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