जम्मू, सतनाम सिंह। सरकारी स्कूलों में वर्षो से टिके और अटैचमेंट का लड्डू खा रहे शिक्षकों के दिन लद गए हैं। शिक्षा विभाग ने नई पारदर्शी तबादला नीति का प्रारूप लगभग तैयार कर लिया है। इसका लाभ शिक्षकों की कमी ङोलने वाले दूरदराज इलाकों के सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को होगा। अब शहर के स्कूलों में एक जगह कईं वर्षो से टिके शिक्षकों और ऐसे स्कूल जहां जरूरत से अधिक अध्यापक हैं, वहां भारी पैमाने में तबादले तय माने जा रहे हैं। शिक्षा विभाग का मकसद शिक्षा स्तर को बेहतर बनाना है ताकि सरकारी स्कूलों का मेरिट में दबदबा रहे।

पूर्व सरकारों के समय जमकर हुए अटैचमेंट और तबादले : पूर्व सरकारों के समय में शिक्षा विभाग में अध्यापकों की अटैचमेंट और तबादले धड़ल्ले से होते रहे हैं। इसके बाद जब राज्यपाल शासन आया तब बड़े पैमाने पर अध्यापकों की अटैचमेंट समाप्त कर दी, लेकिन बाद में हालात पहले जैसे पहुंच गए। आलम यह है यहां शिक्षकों की जरूरत है वहां भारी कमी और यहां जरूरत नहीं क्षमता से अधिक। इसका असर परीक्षा परिणामों भी पड़ रहा है।

शिक्षकों के रिकॉर्ड देखने के बाद तबादले होंगे: 31 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से स्कूल शिक्षा विभाग नई तबादला नीति बनाने में जुट गया। सूत्रों के अनुसार इसका प्रारूप लगभग तैयार कर लिया है। नीति में शिक्षकों के नियुक्ति रिकॉर्ड देखने के बाद उनके तबादले होंगे। विभाग की पहले तबादला नीति है, लेकिन उस पर कभी अमल नहीं हुआ। विभाग शहर के उन स्कूलों में नजर रखे है यहां क्षमता से अधिक शिक्षक हैं। दूरदराज क्षेत्रों में गैर हाजिर रहने वाले शिक्षकों पर कार्रवाई होगी।

22627 स्कूल हैं राज्य में : जम्मू-कश्मीर में प्राइमरी से लेकर हायर सेकेंडरी तक 22627 स्कूल हैं। इन स्कूलों में करीब डेढ़ लाख से अधिक शिक्षक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके अलावा रहबर-ए-तालीम के तहत नियुक्त 40 हजार से अधिक शिक्षक भी हैं जिन्हें पूर्व सरकारों ने दूरदराज क्षेत्रों में नियुक्त किया था। योजना का मकसद था कि ये शिक्षक अपने ही क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर बढ़ाएं। पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने योजना को बंद कर दिया था।

1404 लेक्चरर तीन साल से अधिक समय से एक ही स्कूल में : तीन महीने पहले पूर्व जम्मू कश्मीर राज्य के सूचना अधिकार कानून के तहत प्राप्त जानकारी में खुलासा हुआ था कि 1404 लेक्चरर ऐसे हैं जो तीन साल से अधिक समय से एक ही स्कूल में हैं। उस समय पूर्व जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था। कई लेक्चरर तो ऐसे थे जो पांच से सात साल से ही एक ही स्कूल में पढ़ा रहे थे। जब विभाग ने प्रशासन के हित की बात कहकर तबादले किए तो आरटीआइ के जवाब में यह कहा था कि इसमें मेडिकल बोर्ड नहीं था। स्कूल शिक्षा विभाग ने समय पर नीतियां तो बनाई लेकिन राजनीतिज्ञों, प्रभावशाली लोगों जिसमें अधिकारी आदि शामिल है, का प्रभाव डलवा कर कुछ अध्यापक अपनी मर्जी के स्कूल में लम्बे समय तक टिके रहने में सफल रहे। उचित समायोजन नहीं होने से शहर के कई स्कूलों में अध्यापकों की संख्या काफी अधिक है तो दूर दराज व ग्रामीण इलाकों में अध्यापकों की संख्या कम है। ऐसे में पढ़ाई पर असर पड़ रहा है।

आखिर गांवों में क्यों नहीं जाते शिक्षक: आखिर शहर के स्कूलों में तबादला कराने के लिए शिक्षक क्यों पहुंच का इस्तेमाल करते हैं। पहला दूर दराज क्षेत्रों के स्कूलों में सुविधाएं नहीं हैं। करीब छह महीने पहले के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि जम्मू कश्मीर के दस हजार से अधिक सरकारी स्कूल ऐसे थे जिनमें बिजली नहीं थी। करीब तीन हजार स्कूलों में पीने का पानी उपलब्ध नहीं था। इसका खुलासा भी विभाग के ही आर्डर से ही हुआ था। उसके बाद बिजली और पानी के प्रबंधों की प्रक्रिया को शुरू किया गया। अभी भी सात हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में बिजली की सप्लाई नहीं है। ऐसे में बुनियादी ढांचा बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे

अन्य राज्यों की नजीर तबादला नीतियां हैं..

अन्य राज्यों में शिक्षकों के तबादला नीति पर गौर करें तो ये नजीर साबित हो सकती हैं। हरियाणा में स्थानांतरण के लिए अध्यापकों के लिए ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था है। पांच साल से अधिक समय तक कोई भी शिक्षक एक ही स्कूल या जोन में नहीं रह सकता है। ऐसे में पहले से उनसे स्थानांतरण के विकल्प मांगे जाते हैं। नई शिक्षक स्थानांतरण नीति बनाने का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को उनके मनचाहे स्थान पर भेजना है, ताकि वे शिक्षा की गुणवत्ता में बेहतरी लाई जा सके। चंडीगढ़ शिक्षका तबादला नीति : अध्यापक का एक ही स्थान पर सात वर्ष पूर्ण होने पर तबादला हो सकता है। कोई भी अध्यापक तीन वर्ष से पहले तबादले के लिए आवेदन नहीं दे सकता। तबादले के लिये अंक निर्धारित किए हैं। विभिन्न जोनों में निभाए कार्यकाल के लिए 50 अंक निर्धारित किए हैं और सबसे अधिक अंक उनके लिए रखे गए हैं, जो जोन-5 अर्थात पिछड़े क्षेत्रों में सेवा निभा रहे हैं।

82 स्कूलों का परिणाम शून्य से 20 फीसद: राज्य स्कूल शिक्षा बोर्ड के दसवीं कक्षा का मई में घोषित हुए परिणाम ने विभाग के कामकाज पर प्रश्न चिन्ह लगाया था। जम्मू संभाग के 82 स्कूलों में दसवीं का परिणाम शून्य से बीस प्रतिशत रहा था। राज्य के सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे की कमी, शिक्षा का गिरता स्तर, जवाबदेही की कमी ऐसे कई कारण है जो शिक्षा का स्तर बढ़ाने में रोड़ा अटकाते रहे हैं। विभाग ने ऐसे स्कूलों के संबंधित प्रिसिंपलों और अध्यापकों की सालाना इंक्रीमेंट को बंद किया था।

चुनौती से कम नहीं: प्रशासन हो या शिक्षा विभाग के लिए बड़ी चुनौती यही है कि अध्यापकों की अटैचमेंट पर अंकुश लगाना, अध्यापकों का समायोजन करना और शहरों विशेषकर जम्मू में राजनीतिक या अन्य प्रभावों से कई वर्षो से एक ही जगह डेरा डाले अध्यापकों को हिलाना। जो अध्यापक प्रभावशाली नहीं हैं वे दूरदराज इलाकों में वर्षों से बैठे हैं। वे शहर आने के लिए तरस रहे है। कई अध्यापकों को अटैच करके प्रशासनिक काम में लगाया है। उपराज्यपाल जीसी मुमरू सभी विभागों की तबादला नीति पर नजर रखे हुए हैं। इससे साफ है कि जल्द शिक्षा विभाग कोई बड़ा कदम उठाने जा रहा है।

  • अध्यापकों की अटैचमेंट को तेजी के साथ समाप्त किया जा रहा है। जिलों के आधार पर यह अटैचमेंट समाप्त की जा रही है। जो अध्यापक काफी समय से चुनिंदा स्कूलों में पढ़ा रहे थे, उनको दूसरे स्कूलों में भेजा जा रहा है। तबादला नीति का प्रारूप तैयार किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने कहा कि दूरदराज क्षेत्रों में जिन स्कूलों में सुविधाओं की कमी है वहां ढांचे को मजबूत करने के लिए तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं। - अनुराधा गुप्ता, निदेशक शिक्षा विभाग जम्मू 

Posted By: Rahul Sharma

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