जम्मू, ललित कुमार। कोरोना वायरस के कहर के बीच श्मशानघाट के लॉकरों में अस्थियों का 'लॉकडाउन'। यह भले ही अचंभित करे, लेकिन यह हकीकत है। इस महामारी के बीच लॉकडाउन ने अपनों की अस्थियों के विसर्जन पर भी असर डाला है। जम्मू शहर के सबसे पुराने जोगी गेट श्मशानघाट में ही वर्तमान में 37 अस्थियां लॉकर में रखी हैं। ये अस्थियां उन मृतकों की हैं, जिनका पिछले दस दिनों में लॉकडाउन के बीच अंतिम संस्कार हुआ है।

दरअसल, कोरोना वायरस के कारण देशभर में लॉकडाउन होने से लोग घरों में सिमटकर रह गए हैं। ट्रेनें बंद हैं। बसें भी नहीं चल रही हैं। बिना अनुमति के निजी वाहनों को भी निकालने पर मनाही है। इस हाल में परिवार के लोग अस्थियों को विसर्जित करने के लिए हरिद्वार नहीं जा पा रहे हैं। ऐसे में मृतकों की अस्थियां श्मशानघाट के लॉकरों में रखी जा रही हैं।

जम्मू से अधिकतर लोग अपने परिजनों की अस्थियां हरिद्वार में प्रवाहित करने जाते हैं। हालांकि, कुछ लोगों ने सूर्य पुत्री तवी नदी, पुरमंडल की गुप्त गंगा और चिनाब दरिया में अस्थियां प्रवाहित जरूर की हैं। ऐसे लोगों की संख्या नाममात्र ही है। दस दिनों में 41 लोगों का अंतिम संस्कार जम्मू के सबसे पुराने श्मशानघाट जोगी गेट में लॉकडाउन के इन दस दिनों में 41 लोगों का अंतिम संस्कार हुआ है। इनमें से चार परिवार ऐसे थे, जो अस्थियां चुनने के बाद प्रवाहित के लिए अपने साथ ले गए।

जोगी गेट श्मशानघाट में सेवा भारती के कर्मचारी लाल गोस्वामी के अनुसार एक परिवार तवी नदी में हरि की पौढ़ी में अस्थियां प्रवाहित करने ले गया। दूसरे ने बताया कि वे पुरमंडल जा रहे हैं। दो परिवार यह कहकर अस्थियां ले गए कि वे दरिया चिनाब जाकर इन्हें प्रवाहित करेंगे। 37 मृतकों की अस्थियां लॉकर में रखीं।

लाल गोस्वामी के अनुसार इस समय उनके पास 37 मृतकों की अस्थियां हैं। उनके पास 100 लॉकर हैं, जिनमें अस्थियां रखने की व्यवस्था है। अगर मृतकों की संख्या बढ़ जाए, तो कमरे में कुछ कुंडियां व बेंच भी हैं। यहां अस्थियां सुरक्षित रखने की व्यवस्था है। जोगी गेट की तरह शहर के विभिन्न हिस्सों में मृतकों की अस्थियां इसी प्रकार लॉकर में बंद हैं और लॉकडाउन खुलने का इंतजार कर रही हैं।

आत्मा के मोक्ष के लिए अस्थियां प्रवाहित करना जरूरी

लोग मानते हैं कि अस्थियां प्रवाहित न होने से मृतक की आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता। हालांकि, इस धारणा पर पंडित पवन शास्त्री का कहना है कि यह गलत है। अस्थियां प्रवाहित न होने पर भी सभी कार्य वैसे ही विधि पूर्वक किए जा रहे हैं। पांच दिन, दस दिन व उसके बाद तेरह दिन, ये सब मृतक की आत्मा के मोक्ष के लिए होते हैं। अस्थियां कभी भी प्रवाहित की जा सकती हैं। कई परिवारों में अस्थियां प्रवाहित करने के लिए हरिद्वार जाने वाला अतिरिक्त सदस्य नहीं होता। ऐसे में लोग तेरह दिन की क्रिया करने के पश्चात ही अस्थियां प्रवाहित करने जाते हैं।

Posted By: Preeti jha

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