श्रीनगर, राज्य ब्यूरो। हिंदुस्तान के नक्शे पर वीरवार को दो केंद्र शासित राज्य जम्मू कश्मीर और लद्दाख के उभरने के साथ ही लगभग 45 साल पुराने आपातकाल की अंतिम निशानी छह वर्ष की विधानसभा भी आपातकाल की तरह इतिहास का हिस्सा बन गई है। लद्दाख में विधानसभा का प्रावधान नहीं है, लेकिन जम्मू कश्मीर में विधानसभा का प्रावधान है और जल्द ही इसके चुनाव कराए जाने का कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह संकेत दे चुके हैं।

एकीकृत जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के तहत कई विशेष प्रावधान और अलग संविधान था। इसके कारण कई कानून जम्मू कश्मीर में सीधे लागू नहीं हो सकते थे। एकीकृत जम्मू कश्मीर की विधानसभा किसी भी केंद्रीय कानून के क्रियान्वयन पर राज्य में रोक लगा सकती थी। जम्मू कश्मीर पूरे देश में एकमात्र ऐसा राज्य था, जिसका अपना संविधान और झंडा था। इसके अलावा विधानसभा का कार्यकाल भी छह साल का था।

एकीकृत जम्मू कश्मीर में अलग संविधान और निशान का प्रावधान भारत विलय के दौरान अस्थायी तौर पर मिला था, जिसे कालांतर में विभिन्न राजनीतिक दलों ने वोटों की सियासत की खातिर हटाने से परहेज किया और उसे कथित तौर पर स्थायी साबित करने का प्रयास किया। अलबत्ता, जम्मू कश्मीर की विधानसभा का छह वर्षीय कार्यकाल पूरे देश में 1975 में लागू हुए आपातकाल की देन है। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल लागू करने के बाद संसद और राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को छह साल किया था। इसके लिए भारतीय संविधान में 42वां संशोधन किया गया। उस समय जम्मू कश्मीर में मुख्यमंत्री स्व. शेख मोहम्मद अब्दुल्ला थे। उन्होंने यह कहकर कि जम्मू कश्मीर भी पूरे हिंदुस्तान के साथ चलेगा, वह हिंदुस्तान की मुख्यधारा में है, इसलिए छह साल की विधानसभा का कार्यकाल उन्होंने राज्य संविधान में संशोधन के जरिए कर दिया।

आपातकाल हटने और इसके साथ ही केंद्र में कांग्रेस के सत्ताच्युत होने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री स्व. मोरार जी देसाई ने जनता पार्टी के नेतृत्व में सत्ता संभालने पर संसद और विधानसभा का कार्यकाल फिर पांच साल कर दिया। पूरे देश में यह व्यवस्था लागू हो गई, लेकिन जम्मू कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल छह से पांच साल नहीं हुआ, क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और उनके बाद जिसने भी जम्मू कश्मीर में सत्ता संभाली, सभी ने छह साल की विधानसभा को बनाए रखने को ही प्राथमिकता दी। संबंधित केंद्रीय कानून जो पांच साल के कार्यकाल की व्यवस्था करता है, उसे अनुच्छेद 370 की आड़ में कभी भी जम्मू कश्मीर में लागू नहीं होने दिया गया।

वर्ग विशेष के तुष्टिकरण ने जिंदा रखा छह साल का कार्यकाल

जम्मू कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ डॉ. अजय चुरुंगू ने कहा कि एकीकृत जम्मू कश्मीर में कश्मीर केंद्रित और एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की जो सत्ता रही है, वह अनुच्छेद 370 के चुनिंदा इस्तेमाल का एक सुबूत है। राज्य विधानसभा का कार्यकाल छह से पांच साल नहीं किया गया, इसके पीछे मंशा सिर्फ जम्मू कश्मीर को राष्ट्रीय मुख्यधारा से अलग रखने और लोगों में अलगाववाद की भावना को बनाए रखने की थी। अब जम्मू कश्मीर का अपना संविधान समाप्त हो चुका है, अलग निशान भी नहीं है। संवैधानिक और राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह बदल चुकी है। केंद्र शासित राज्य जम्मू कश्मीर में विधानसभा होगी। इसके जल्द गठित कराए जाने की चर्चा है और जब भी बनेगी इसका कार्यकाल छह साल नहीं होगा पांच साल ही होगा। केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में अब केंद्रीय कानून ही चलेगा और जब कभी जम्मू कश्मीर दोबारा पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल करेगा, उस समय भी विधानसभा का कार्यकाल पांच साल ही रहेगा। आज सिर्फ जम्मू कश्मीर का भारत में सिर्फ पूर्ण विलय का दिन ही नहीं है, यह भारत में आपातकाल की एक अंतिम निशानी के भी समाप्त होने का दिन है।

Posted By: Rahul Sharma

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