लद्दाख में बदलेगा सत्ता का गणित? कारगिल काउंसिल भंग करने की सिफारिश करेंगे जफर अखून, BJP में जाने की अटकलें तेज
कारगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के चेयरमैन मोहम्मद जफर अखून परिषद भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं और भाजपा में शामिल होने की संभावना है।
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कारगिल काउंसिल भंग करने की सिफारिश करेंगे जफर अखून (फाइल फोटो)
HighLights
जफर अखून परिषद भंग कर भाजपा में हो सकते हैं शामिल।
कारगिल और लद्दाख की राजनीति में आएगा बड़ा बदलाव।
नए जिलों, परिसीमन से चुनावी गणित पर पड़ेगा असर।
राज्य ब्यूरो, जम्मू। लद्दाख की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। कारगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के चेयरमैन एवं मुख्य कार्यकारी पार्षद मोहम्मद जफर अखून ने परिषद को भंग करने की सिफारिश करने का फैसला किया है।
उनके जल्द ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने और नेशनल कॉन्फ्रेंस के कुछ पार्षदों के भी उनके साथ जाने की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो कारगिल में राजनीतिक शक्ति संतुलन बदल सकता है और इसका असर लद्दाख की व्यापक राजनीति पर भी पड़ सकता है।
सांकू को जिला बनाने की घोषणा और लद्दाख की आठ हिल डेवलपमेंट काउंसिलों के निर्वाचन क्षेत्रों के प्रस्तावित परिसीमन के बीच यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आगामी चुनावों से पहले क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, स्थानीय नेतृत्व और विकास से जुड़े मुद्दे राजनीतिक दलों की रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
जफर अखून के अनुसार, सांकू को जिला बनाने का उनका सपना पूरा हो गया है। केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन जल्द ही आठों परिषदों के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करेगा, जिसके बाद चुनाव कराए जाएंगे।
उनका मानना है कि नए जिलों और परिषदों के गठन से कारगिल की मौजूदा भौगोलिक संरचना में बदलाव आया है। ऐसे में परिसीमन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए वह परिषद को भंग करने की सिफारिश करेंगे।
भाजपा के साथ जाने से बदलेगा सत्ता का गणित
नेशनल कान्फ्रेंस के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे अखून को भाजपा के समर्थन से परिषद में बहुमत हासिल करने के बाद पार्टी ने निलंबित कर दिया था। उनके संभावित भाजपा प्रवेश से कारगिल में नए राजनीतिक गठजोड़ की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
इस वर्ष मई में नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस के 16 पार्षदों ने अखून के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की पहल की थी। 30 सदस्यीय परिषद में दोनों दलों के पास बहुमत था।
सत्ता-साझाकरण समझौते के तहत ढाई वर्ष बाद परिषद का नेतृत्व कांग्रेस को सौंपा जाना था। नासिर मुंशी इस पद के संभावित दावेदार माने जा रहे थे।
हालांकि, प्रशासन ने शक्ति परीक्षण का आदेश नहीं दिया। 13 जुलाई को बजट के दौरान अखून को 20 पार्षदों का समर्थन मिला। भाजपा के सहयोग से उनकी स्थिति मजबूत हुई और कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव आगे बढ़ाने पर जोर नहीं दिया। अब यदि अखून पर्याप्त संख्या में पार्षदों को अपने साथ ले जाते हैं, तो भाजपा को कारगिल में अपना आधार मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।
नए जिलों से बदलेगा चुनावी गणित
लद्दाख में पहले लेह और कारगिल दो जिले तथा दो हिल डेवलपमेंट काउंसिलें थीं। बाद में नुब्रा, चांगथांग, शाम, द्रास, जांस्कर और सांकू समेत छह नए जिलों की घोषणा की गई, जिनके लिए अलग परिषदों का प्रावधान है।
पुनर्गठन के कारण कारगिल परिषद के कुछ निर्वाचन क्षेत्र दूसरी परिषदों के अंतर्गत आ गए हैं। इसी वजह से लगभग आधा दर्जन पार्षदों के इस्तीफे दिए हैं। इनमें भाजपा के चार पार्षद बताए गए हैं, जिनमें दो निर्वाचित और दो मनोनीत सदस्य शामिल हैं।
पूरे लद्दाख पर पड़ सकता है असर
आठों परिषदों के चुनाव भाजपा, नेशनल कान्फ्रेंस, कांग्रेस और स्थानीय राजनीतिक समूहों के लिए अपनी ताकत दिखाने का अवसर होंगे। रोजगार, विकास, क्षेत्रीय पहचान और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि, कारगिल में भाजपा की संभावित बढ़त का असर लेह में भी समान रूप से पड़ेगा, यह कहना जल्दबाजी होगी।कारगिल परिषद का मौजूदा कार्यकाल अक्टूबर 2028 तक है, लेकिन परिसीमन और चुनाव संबंधी औपचारिकताओं से कार्यक्रम प्रभावित हो सकता है।
